न्यायालय ने कहा कि नियमों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि प्रमाणपत्र जारी होने की तारीख ही बैच की गणना के लिए प्रासंगिक होगी, बल्कि पास होने का वर्ष और महीना ही मायने रखेगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी पाया कि इस मामले में प्रभावित चौथे प्रतिवादी की कोई गलती नहीं थी, जिसे पहले नियुक्त किया गया था और अपने पद पर बरकरार रखा है।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने शैक्षणिक सत्र 2003-2005 में अपना आयुर्वेदिक फार्मेसी में डिप्लोमा पूरा किया और अंतिम परीक्षा जून 2005 में दी थी। हालांकि, उसका डिटेल मार्क्स सर्टिफिकेट 7 अप्रैल 2006 को जारी हुआ। जब आयुर्वेदिक फार्मेसी अधिकारी के पद पर बैचवाइज चयन हो रहा था, तो स्क्रीनिंग कमेटी ने प्रमाणपत्र जारी होने की तारीख को आधार बनाते हुए उसे 2006 बैच का उम्मीदवार मान लिया और 2005 बैच के तहत उसकी नियुक्ति अस्वीकार कर दी। याचिकाकर्ता ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि उसका डिप्लोमा शैक्षणिक सत्र 2004-2005 का था और उसने परीक्षा जून 2005 में पास कर ली थी। न्यायालय ने पाया कि भले ही प्रमाणपत्र 7 अप्रैल 2006 को जारी किया गया हो, लेकिन प्रमाण पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि परीक्षा आयुर्वेदिक फार्मेसी द्वितीय वर्ष 2004-2005 से संबंधित थी।