प्रदेश के लोगों को यात्रा से साक्षी बनने पर पहली बार कई देव परंपराओं का पता चला है। इसमें चालदा महासू के आगे-आगे चलने वाले काडका (स्थानीय भाषा में तांबे के विशाल बर्तन) परंपरा का हिस्सा रहा। न्याय के देवता चालदा महासू अपनी पालकी में आते हैं। पालकी के आगे-आगे काडका और छत्र न्याय के प्रतीक के रूप में आगे रहता है। माना जाता है कि यह देव आगमन का संकेत देते हैं। रास्ते में आने वाली बाधाओं को भी दूर करते हैं।
पशमी मंदिर समिति के भंडारी रघुवीर सिंह, दिनेश चौहान, प्रकाश चौहान और प्रदीप सिंह ने बताया कि चालदा महासू महाराज की यात्रा में करीब 70 बकरे भी साथ पहुंचे हैं। इनकी सेवा के लिए गांव के ही परिवारों को जिम्मा दिया गया है। रोज एक परिवार इनको गांव के चरागाह और जंगल में ले जाते रहेंगे। चार-पांच बकरे मंदिर परिसर के आसपास ही रहते हैं।