अदालत ने विभाग से पूछा कि जनहित याचिका 2014 में दायर की गई है, उसके बाद 10 साल तक ट्रॉमा सेंटर को ठीक करने के लिए क्या किया। ट्रॉमा सेंटर में कितना नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल डॉक्टर और अन्य स्टाफ स्थायी तौर पर नियुक्त किया है, इसकी भी जानकारी मांगी। स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर के लिए अलग से नर्सों का बंदोबस्त नहीं किया गया है। विभाग ने रिकॉर्ड पेश करते हुए कहा कि न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन, प्लास्टिक सर्जन, लैब तकनीशियन, एमआरआई और मल्टी टास्क वर्करों की संख्या शून्य और रेडियोलोजिस्ट एक है। अदालत ने हैरानी जताते हुए कहा कि विभाग इतना लापरवाह कैसे हो सकता है।
सरकार ने कहा-31 मार्च तक दूर करेंगे कमियां
सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने कहा कि जल्द नर्सों के 110 और 1200 अन्य पद आउटसोर्स पर भरे जाएंगे। मशीनरी व उपकरण भी खरीदे जा रहे हैं। आउटसोर्स के स्थान पर नियमित भर्तियों के सवाल पर कहा कि सरकार स्थायी भर्तियां भी कर रही है, लेकिन तब तक काम चलाने के लिए आउटसोर्स पर नर्सें भर्ती होंगी। 31 मार्च 2025 तक विभाग सभी कमियों को दूर करने का हरसंभव प्रयास करेगा। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि अस्पतालों के लिए 90 फीसदी अनुदान केंद्र सरकार देती है। इस राशि से विभाग अपनी मशीनें और उपकरण खरीदते हैं।
प्रधानाचार्य ने मानी गलती, स्वास्थ्य सचिव को हलफनामा देने के आदेश
आईजीएमसी प्रधानाचार्य ने माना कि यह विभाग की गलती है और भविष्य में ऐसी गलती सुधारी जाएगी। अदालत ने अगली सुनवाई को स्वास्थ्य सचिव को व्यक्तिगत तौर पर हलफनामा दायर करने के आदेश दिए हैं। अगली सुनवाई 2 जनवरी को होगी। अदालत में सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य सचिव एम सुधा देवी के अलावा निदेशक चिकित्सा शिक्षा और आईजीएमसी प्रधानाचार्य सहित विभाग के अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।