अदालत ने कहा कि जब किसी रास्ते के उपयोग को लेकर विवाद से शांति भंग होने की आशंका हो और ग्रामीणों का उस रास्ते पर लंबे समय से स्थापित उपयोग का अधिकार हो, तब दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 147 के तहत एसडीएम कार्रवाई कर सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थानीय प्रथागत कानूनों (वाजिब-उल-अर्ज) के तहत मान्यता प्राप्त रास्तों को भू-स्वामी भी बंद नहीं कर सकता। यह मामला किन्नौर जिले की सांगला तहसील के बटसेरी गांव का है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ताओं ने खसरा नंबर 720 में स्थित एक पारंपरिक रास्ते को बंद कर दिया है, जिसका उपयोग ग्रामीण पिछले 70-80 वर्षों से खेतों, घरों, श्मशान घाट और स्थानीय देवता की पालकी ले जाने के लिए करते आ रहे हैं। पुलिस जांच में पाया गया कि रास्ता बंद रहने से क्षेत्र में शांति भंग होने की संभावना है। इसके बाद मामला एसडीएम के समक्ष प्रस्तुत किया गया। तहसीलदार सांगला की रिपोर्ट और स्थानीय गवाहों के बयान के आधार पर एसडीएम ने जून 2023 में रास्ते से अवरोध हटाने का आदेश दिया था।
इसी आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि विवादित भूमि याचिकाकर्ताओं की निजी सह-स्वामित्व वाली जमीन है, लेकिन ग्रामीणों ने कभी उस भूमि पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया। उनका दावा केवल रास्ते के उपयोग के अधिकार तक सीमित था। अदालत ने कहा कि एसडीएम का आदेश तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक कोई सक्षम सिविल न्यायालय यह घोषित न कर दे कि भूमि पर केवल याचिकाकर्ताओं का पूर्ण अधिकार है और अन्य ग्रामीणों को उसके उपयोग का कोई अधिकार नहीं है।
प्रदेश हाईकोर्ट ने वित्तीय आयुक्त अपील का पद रिक्त होने के चलते एसडीओ (सिविल) अंब की ओर से 10 नवंबर 2021 को पारित आदेश और डिविजनल कमिश्नर कांगड़ा की ओर से 28 मार्च 2025 को दिए गए आदेश के क्रियान्वयन और संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। इसके साथ ही वेकेशन जज न्यायाधीश रोमेश वर्मा ने राज्य सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। याचिकाकर्ता अदालत के समक्ष दलील दी कि डिविजनल कमिश्नर कांगड़ा की ओर से 28 मार्च 2025 को पारित आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने 3 जून 2026 को वित्तीय आयुक्त (अपील)हिमाचल प्रदेश सरकार के समक्ष एक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। कोर्ट को बताया कि वर्तमान में वित्तीय आयुक्त का पद खाली चल रहा है और इस पद का अतिरिक्त कार्यभार भी किसी अन्य अधिकारी को नहीं सौंपा गया है। इस वजह से याचिकाकर्ता की अर्जी पर सुनवाई नहीं हो पा रही थी, जिसके चलते उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इस मामले को अब चार सप्ताह के बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।