आदेशों की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, शिक्षा विभाग पर 10 हजार का जुर्माना
प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालती आदेशों की लगातार अनदेखी करने पर राज्य सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत की ओर से बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद फ्रेश कंसीडरेशन ऑर्डर रिकॉर्ड पर न लाने के कारण सरकार पर 5 हजार प्रति याचिकाकर्ता (कुल 10,000) का जुर्माना लगाया है। यह आदेश परमजीत यादव व अन्य की ओर से दायर अनुपालना याचिका की सुनवाई के बाद जारी किया गया। यह मामला हिमाचल प्रदेश सिविल सेवा (संशोधित वेतन) नियम, 2022 के तहत उच्च वेतन मैट्रिक्स का लाभ दिए जाने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने 5 सितंबर 2025 को सरकार को निर्देश दिए थे कि वे छह हफ्तों के भीतर याचिकाकर्ताओं के मामले पर नए सिरे से विचार करें। समय सीमा बीत जाने के बाद भी आदेश का पालन न होने पर याचिकाकर्ताओं ने निष्पादन याचिका दायर की थी। कोर्ट ने अब सरकार को हर्जाना भरने के साथ अनुपालन रिपोर्ट सौंपने का अंतिम मौका दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।
हाईकोर्ट ने 16 साल पुराने पदोन्नति मामले में याचिका की खारिज
प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवा मामलों से जुड़े अत्यधिक देरी से दायर की गई याचिकाओं जो तीसरे पक्षों के अधिकारों और वरिष्ठता को प्रभावित करती है को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने 16 साल पुराने पदोन्नति मामले पर वरिष्ठता में देरी से कारण याचिकाकर्ता का दावा खारिज कर दिया है। अदालत ने राज्य की ओर से उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति को सही ठहराते हुए कहा कि लंबे समय से तय हो चुकी व्यवस्था को इतने वर्षों बाद फिर से उधेड़ा नहीं जा सकता है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने याचिकाकर्ता संजय कुमार बनाम की ओर से दायर याचिका को विलंब और लचर रवैये के आधार पर खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि उन्हें वर्ष 2009 से 1973 के आर एंड पी नियमों के तहत दो साल की नियमित सेवा पूरी करने पर प्रवक्ता (वाणिज्य) के पद पर पदोन्नत किया जाए।
इसके अलावा उन्होंने वरिष्ठता के पुनर्निर्धारण, वेतन बकाए और पेंशन लाभों जैसे सभी आनुषंगिक लाभों की भी मांग की थी।अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ता 2009 में पदोन्नति का दावा कर रहे थे,जबकि उन्हें वास्तव में 28 अगस्त 2012 को 5 वर्ष की सेवा पूरी होने के बाद पदोन्नत किया गया था। 2009 के संदर्भ में 16 वर्ष और 2012 के संदर्भ में लगभग 14 वर्ष बाद अदालत का रुख करना किसी भी स्थिति में उचित समय नहीं माना जा सकता।याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि वह तीन साल के वित्तीय बकाए का दावा छोड़ देंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला केवल पैसे तक सीमित नहीं है। 2009 से 2012 के बीच कई अन्य प्रवक्ताओं को पदोन्नत किया गया होगा। यदि याचिकाकर्ता की मांग स्वीकार की जाती है, तो वर्षों से तय हो चुकी वरिष्ठता और उसके बाद मिली पदोन्नतियां प्रभावित होंगी,जो कि न्यायसंगत नहीं है।