हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जमानत मामले में फैसला देते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि आरोपी व्यक्ति को लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखना पूर्व-परीक्षण दंड के सिवा कुछ नहीं है। न्यायाधीश विरेंद्र सिंह ने कहा कि आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका दोष साबित नहीं हो जाता। आवेदक समानता के आधार पर जमानत पाने का भी हकदार है। सह-आरोपी को इस न्यायालय की ओर से 8 नवंबर 2024 को जमानत पर रिहा कर दिया गया है। अदालत ने हत्या के इस मामले में आरोपी को 50 हजार की राशि के निजी मुचलके के तहत जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए हैं।
अदालत ने रिकॉर्ड को देखते हुए पाया कि आवेदक 4 वर्ष 2 महीने से न्यायिक हिरासत में है। इतनी लंबी अवधि के बावजूद अभी तक मुकदमा समाप्त नहीं हुआ है। इस मामले में अभियोजन के कुल गवाह 51 हैं, जिनमें से अभी तक केवल 15 की जांच की गई है। इसे देखते हुए भविष्य में और कितना समय लगेगा, कहा नहीं जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अत्यधिक देरी भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके बहुमूल्य अधिकार का उल्लंघन करती है। वहीं आवेदक की ओर से बताया गया कि वह केवल 25 वर्ष की है। आवेदक ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 483 के तहत हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी। आरोपी पर आईपीसी की धारा 302, 120 बी और 201 के तहत वर्ष 2021 में एफआईआर दर्ज की गई थी।