राज्य के ऊपरी और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में आमतौर पर इस समय तक पर्याप्त ठंड और नमी मिल जाती थी, जिससे बागवान गोबर की खाद डालने, कटाई-छंटाई और नए पौधरोपण का काम शुरू कर देते हैं, लेकिन इस बार नमी की भारी कमी के चलते बागवान इन कार्यों से भी गुरेज कर रहे हैं। मिट्टी सूखी होने के कारण खाद डालने से लाभ के बजाय नुकसान का डर सता रहा है। बागवानी विशेषज्ञों के अनुसार सेब के लिए 1400 से 1600 चिलिंग आवर्स आवश्यक होते हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में यह आंकड़ा अब तक काफी पीछे है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण सेब बागवानी के पारंपरिक क्षेत्र लगातार दबाव में आ रहे हैं। यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो सेब उत्पादन के साथ-साथ हजारों बागवान परिवारों की आजीविका पर भी गहरा संकट खड़ा हो सकता है।