इसरो ने पहले ही कई ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील सूची में डाला है। लाहौल की घेपन झील भी इस सूची में शामिल है। अब यहां लगने वाला यह सिस्टम भविष्य में आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। घेपन झील समुद्र तल से 13,615 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी गहराई 100 मीटर से अधिक मानी जाती है।
झील के चारों ओर ऊंचे बर्फीले पहाड़ और ग्लेशियर हैं। लगातार जलवायु परिवर्तन और बर्फ पिघलने से इसका आकार हर साल बढ़ रहा है। अगर यह झील टूटी तो पानी सीधे चंद्रा नदी में जाएगा और लाहौल के कई गांवों के साथ-साथ मनाली-लेह सामरिक हाईवे और अटल टनल मार्ग को भी नुकसान पहुंचा सकता है। उपायुक्त लाहौल-स्पीति किरण भड़ाना ने बताया कि विशेषज्ञों और तकनीकी टीम ने हाल ही में घेपन झील का दौरा किया है। जल्द ही यहां हिमाचल का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा। यह सिस्टम सैटेलाइट की मदद से काम करेगा और मौसम विभाग, प्रशासन को आपदा की पूर्व सूचना उपलब्ध कराएगा।