गाय गोबर से तैयार किए गए ऑर्गेनिक दीये। संवाद
हमीरपुर। इस बार दिवाली में परंपराओं के साथ पर्यावरण संरक्षण की भी झलक देखने को मिल रही है। गाय के गोबर से बने दीयों की काफी डिमांड है। हिमाचल राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों ने दिवाली पर विशेष रूप से दीये तैयार किए हैं। गोबर से बने दीये पांच से सात रुपये में बिक रहे हैं। महिलाओं ने बचत भवन की ऊपरी मंजिल में दीयों के स्टॉल लगाए गए हैं, जहां इन्हें बेचा जा रहा है।
लोग गाय के गोबर को पवित्र मानते हैं, जिसकी वजह से गोबर से बने दीयों की मांग अधिक है। खास बात यह है कि यह पानी से भी खराब नहीं होते न ही आसानी से टूटते हैं। इन्हें लोग लंबे समय तक अपने घरों में स्थापित करके रख सकते हैं।
इन ईको फ्रेंडली दीयों को खाद के रूप में इस्तेमाल करके गमले में डाला जा सकता है। राधाकृष्ण स्वयं सहायता समूह जंगलरोपा की महिलाओं स्नेहलता, सहयोगियों मीनू बाला और आशुतोष ने बताया कि पूर्व में ग्रामीण स्तर दीये बेचने का कार्य शुरू किया था लेकिन बाजार से डिमांड अधिक आने के कारण अब बाजार में दीये बेचने का निर्णय लिया है ताकि लोगों को ईको फ्रेंडली दीये उपलब्ध करवाए जा सकें। अभी तक 10 हजार रुपये के दीये बेच चुके हैं। महिलाओं ने आगामी समय में गोबर से मूर्तियां बनाने का निर्णय लिया है ताकि लोगों को कम दामों में मूर्तियां उपलब्ध करवाई जा सकें।
ऐसे बनाए जाते हैं दीये
दीये बनाने के लिए पहले गाय के गोबर में बामी (दीमक के टिल्ले) की चिकनी मिट्टी मिलाई जाती है। फिर सांचे में डालकर दीये बनाने का कार्य शुरू होता है। दीयों को आकर्षक बनाने के लिए रंग किया जाता है। एक दिन में 100 से 200 दीये तैयार हो जाते हैं। दीयों को सूखने में दो दिन का समय लगता है।