संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में प्रदेश के 53 जांबाजों में से जिला हमीरपुर के आठ जांबाज भी वतन पर कुर्बान हुए थे। कारगिल विजय दिवस पर प्रदेशवासियों और जिलावासियों को इन शहीदों की शहादत याद आई है और एक बार फिर आंख नम हुई है। इन जांबाजों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की रक्षा की है।
जिला हमीरपुर के आठ शहीदों के परिवार तो वर्तमान में उचित स्थिति में हैं और सरकार से हर संभव सहायता और सहयोग उन्हें मिला है, लेकिन 23 साल पहले हुए कारगिल युद्ध को याद कर परिजनों के जख्म ताजा हो जाते हैं। परिजनों का कहना है कि लगता है कि कल की ही बात है। हालांकि सरकार ने शहीदों के नाम पर की अधिकांश घोषणाएं तो पूरी कर दी हैं, लेकिन शहीद कश्मीर सिंह के नाम पर ऊहल में प्रवेश द्वार बनाने की घोषणा अभी तक पूरी नहीं हुई है। वहीं, शहीद दिनेश की शहादत के 22 वर्षों बाद उनके स्थानीय स्कूल ऊटपुर का नामकरण भी वर्ष 2021 के अक्तूबर माह में किया गया। शेष शहीदों के परिवारों का कहना है कि उन्हें सरकार से हर सहयोग मिला है और उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं है।
ये रणबांकुरे हुए देश की सरहद पर कुर्बान
दीपचंद ने मार गिराए दो आतंकी
24 साल की उम्र में शहीद होने वाले सिपाही दीप चंद 10 मार्च 1976 को गांव व डाकघर बरोटी, बड़सर जिला हमीरपुर में सूबेदार बसंत सिंह के जन्मे थे। इनकी दसवीं तक की शिक्षा स्थानीय स्कूल धंगोटा में हुई। दसवीं कक्षा के बाद दीप चंद सेना में सिपाही पद पर 13 जैक राइफल में भर्ती हो गए। सिपाही दीप चंद के परिवार को मरणोपरांत राष्ट्रपति द्वारा विशिष्ट सेना मेडल से सम्मानित किया गया। सिपाही दीप चंद ने एनकांउटर के दौरान दो आंतकवादियों को मार गिराया था। 6 जुलाई 1999 को दीपचंद अपने 13 साथियों सहित कारगिल के द्रास सेक्टर में आंतकवादियों का एनकांउटर करने जा रहे थे कि रात के अंधेरे में आंतकवादियों ने अचानक ही गोलाबारी शुरू कर दी। इस दौरान टुकड़ी में तैनात दीपचंद को दुशमनों की गोलियां लग गईं, जिनसे वह शहीद हो गए। इन्हें शौर्य पुरस्कार मेंशन इन डिस्पेचिस से भी सम्मानित किया गया है।
प्रवीण ने 28 की उम्र में पाई शहादत
शहीद प्रवीण कुमार का जन्म गांव सन्हाणी डाकघर कुल्हेड़ा तहसील बिझड़ी में हुआ था। वह वर्ष 1997 में बतौर राइफलमैन 13 जैक राइफल में सेना में भर्ती हुए थे। छह जुलाई 1999 को द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लोहा लेते हुए प्रवीण कुमार शहीद हुए। उनकी पांच बहने और दो भाई हैं। वह शादीशुदा थे। उनकी बेटी बीएससी नर्सिंग कर रही है, जबकि पत्नी तहसील कार्यालय बिझड़ी में कार्यरत हैं। जब वह शहीद हुए थे तो उनकी बेटी महज एक साल की थी। प्रवीण कुमार ने 28 साल की उम्र में शहादत पाई थी। शहीद प्रवीण कुमार ने कुल्हेड़ा स्कूल से दसवीं तक की पढ़ाई की। 21 साल की उम्र में वह सेना में भर्ती हो गए थे।
बर्फ में मिली थी राजकुमार की पार्थिव देह
हवलदार राजकुमार 37 साल की उम्र में दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुए। शहीद जिला के गांव बागलू डाकघर कक्कड़ तहसील टौणी देवी निवासी थे। उनका जन्म 1 मई 1962 को बागलू निवासी खजान सिंह के घर पर हुआ। दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजकुमार 28 मई 1979 को 14 जैक राइफल में भर्ती हुए। कारगिल सेक्टर में दुश्मनों से लोहा लेते हुए राजकुमार 5 जून 1999 को शहीद हुए। शहीद होने की सूचना पत्नी शकुंतला देवी को टेलीग्राम से मिली, लेकिन शहीद की पार्थिव देह बर्फ में दब गई थी। ढाई माह बाद सेना को बर्फ में शहीद की देह मिली। शहादत के ढाई माह बाद अंतिम संस्कार किया गया। शहीद के नाम पर कक्कड़ स्कूल का नाम और कक्कड़ से सचूही रोड का नाम रखा गया है। इन्हें शौर्य पुरस्कार मेंशन इन डिस्पेचिस से भी सम्मानित किया गया है।
दिनेश ने 20 की उम्र में पीया शहादात का जाम
शहीद दिनेश कुमार 20 साल की उम्र में देश पर कुर्बान हो गए थे। शहीद के पिता और बड़ा भाई भी भारतीय सेना में थे। पिता और भाई के नक्शे कदम पर चलते हुए दिनेश कुमार ने जमा दो की परीक्षा पास करने के बाद 1997 में भारतीय सेना ज्वाइन की। वह तीन पंजाब रेजिमेंट में भर्ती हुए। जिला के गांव अंदराल डाकघर ऊहल तहसील टौणी देवी में कैप्टन भूप सिंह के घर में जन्मे दिनेश को बचपन से ही सेना में जाने का जज्बा था। पिता और भाई की वर्दी देख उन्होंने भी सेना में जाने का सपना पाला और भर्ती हुए। 17 जून 1999 को पुंछ सेक्टर में मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने शहादत पाई। उनके बड़े भाई वर्ष 2009 में सेना से सेवानिवृत्त हुए।
पुंछ सेक्टर में वीरगति को प्राप्त हुए स्वामी दास
हवलदार स्वामी दास चंदेल जिला के गांव समलेहड़ा डाकघर बगवाड़ा के निवासी थे। 3 जुलाई 1999 को पुंछ सेक्टर में में दुश्मनों से लोहा लेते हुए स्वामी दास चंदेल वीरगति को प्राप्त हुए। उनके पिता स्वर्गीय कांशी राम और भाई भी सेना में सेवारत रहे। देश सेवा का जज्बा पाले हुए स्वामी दास चंदेल भी 7 सितंबर 1977 को सेना में भर्ती हुए। शहीद के तीन बच्चों में से एक बेटी की शादी हो चुकी है, जबकि एक बेटा मुनीष उपायुक्त कार्यालय में और दूसरे बेटे रजनीश ने पिता की शहादत के बाद सेना में जाने का जज्बा पाला और देश सेवा की भावना लिए 2009 में सेना में भर्ती हुए। पिता के शहीद होने के समय रजनीश महज नौ साल का था। बड़े बेटे मुनीष ने कहा कि सरकार की तरफ से हर संभव सहायता और सहयोग मिला है।
घुसपैठियों को खदेड़ते शहीद हुए राकेश
जिले के गांव कच्छपलाही के 22 वर्षीय सिपाही राकेश कुमार कारगिल सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। राकेश कुमार पुत्र दिवंगत रण सिंह को बचपन से ही देश सेवा का जज्बा था और इसके लिए जमा दो की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दिसंबर 1996 में भारतीय सेना की 27 राजपूत रेजिमेंट में भर्ती हुए। वह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके नाम पर बीर बगेहड़ा स्कूल का नाम पड़ा है। भाई कर्म चंद ने बताया कि सरकार की तरफ से हर संभव मदद की गई है। 6 जुलाई 1999 को कारगिल सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ते हुए राकेश कुमार ने शहादत पाई।
23 की उम्र में वतन पर कुर्बान हो गए सुनील
सैनिक परिवार में गांव बल्ह तयान्कड़ डाकघर चबूतरा में जन्मे शहीद सुनील कुमार 23 वर्ष की उम्र में शहीद हो गए थे। दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वी वर्ष 1994 में भारतीय सेना की 28 आरआर/20 जैक राइफल में भर्ती हुए। शहीद के पिता और चाचा भी सेना से सेवानिवृत्त हैं। उनके चचेरे तीन भाई भी भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे हैं। इन्होंने सुनील कुमार की शहादत के बाद सेना में जाकर देश सेवा का निर्णय लिया। एक चचेरा भाई प्रवीण कुमार सुनील के साथ ही भर्ती हुआ था और अब बतौर सूबेदार सेवाएं दे रहा है, जबकि एक चचेरा भाई बतौर लेफ्टिनेंट सेना में भर्ती हुआ है। सुनील 18 जुलाई 1999 को आतंकियों से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके नाम पर मन्हाल स्कूल का नाम है।
शहीद कश्मीर के नाम पर नहीं बना प्रवेश द्वार
शहीद हवलदार कश्मीर सिंह 17 साल की उम्र में 22 दिसंबर 1979 को भारतीय सेना की 14 जैक रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। उनका जन्म 1 अगस्त 1962 को गांव और डाकघर ऊहल तहसील टौणी देवी में हुआ। कारगिल सेक्टर में आतंकियों से लोहा लेते हुए 5 जून 1999 को शहीद कश्मीर लाल वीरगति को प्राप्त हुए। इनका एक बेटा और एक बेटी है। दोनों की शादी हो चुकी है। बेटा उपायुक्त कार्यालय हमीरपुर में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत है। ऊहल स्कूल का नाम शहीद के नाम पर रखा गया है। इन्हें शौर्य पुरस्कार मेंशन इन डिस्पेचिस से भी सम्मानित किया गया है। इनके नाम पर ऊहल जंदड़ू चौक का नाम तो रखा है, लेकिन शहीद के नाम पर प्रवेश द्वार बनाने की घोषणा अभी पूरी नहीं हुई है। शहीद के बेटे सुरेंद्र ने कहा कि प्रवेश द्वार बनाने के बारे में प्रशासन कार्रवाई कर रहा है।