घर से छोटे स्तर पर शुरू किया गया कारोबार, आज बना उनकी आत्मनिर्भरता की पहचान
चीड़ की पत्तियों से बना रहीं आभूषण, सजावटी सामान और कई तरह के स्वदेशी उत्पाद
संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। मसियाणा गांव की आशुतोष ने जंगलों बेकार पड़ी चीड़ की पत्तियों को अपने हुनर से सोने-चांदी जैसा मूल्य दिया है। घर से ही छोटे स्तर पर शुरू किया गया यह काम आज उनकी आत्मनिर्भरता की पहचान बन चुका है।
आशुतोष चीड़ की पत्तियों को विशेष आकार देकर आभूषण, सजावटी सामान और कई तरह के स्वदेशी उत्पाद तैयार कर रही हैं, जिनकी मांग लगातार बढ़ रही है। पहाड़ों में चीड़ की पत्तियों को अक्सर जंगल की आग का कारण माना जाता है, लेकिन आशुतोष ने इन्हीं पत्तियों में रोजगार का नया अवसर खोजा। शुरुआत में उन्होंने कर्णफूल, हेयरपिन, चूड़ी, चाबी के छल्ले और सजावटी हैंगिंग तैयार किए। देखते ही देखते ये उत्पाद स्थानीय बाजारों में काफी पसंद किए जाने लगे।
अब उन्होंने पत्तियों के साथ धागे के जोड़ से विभिन्न प्रकार के त्योहारों में पहने जाने वाले आभूषण, टोकरियां, मैट्स और विभिन्न प्रकार के सजावटी फूलदान बनाने का कार्य शुरू किया है। इससे उन्हें प्रतिमाह आठ से 10 हजार रुपये की आय हो रही है। घर पर सामान बनाने के साथ वे ग्रामीण महिलाओं को भी प्रेरित करके प्रशिक्षण दे रही हैं ताकि गांव में महिलाओं को घर से कार्य करने में सुविधा मिल सके।
आशुतोष ने कहा कि शुरुआती दौर में कार्य करने में काफी परेशानी होती थी लेकिन ऑनलाइन यू ट्यूब और प्रशिक्षण केंद्रों में अभ्यास के बाद अधिक प्रभावी तरीके से कार्य करने में सफलता मिली। अब घर पर सामान के ऑर्डर आ रहे हैं। इन्हें बेचकर परिवार का पालन पोषण कर रही हैं। उन्होंने कहा कि चीड़ की पत्तियों से बना यह स्वदेशी कारोबार न केवल पर्यावरण संरक्षण की मिसाल है, बल्कि पहाड़ों में रोजगार सृजन का नया अवसर भी है।