प्राकृतिक खेती के तहत लहलहाती मक्की की फसल। -स्रोत : जनसंपर्क विभाग
- फोटो : बाढ़ से पानी से बाहर निकलते लोग।
हमीरपुर। जिला हमीरपुर में आतमा परियोजना के माध्यम से गांव-गांव में प्राकृतिक खेती की अलख जगाई जा रही है। अब तक 20 हजार से अधिक किसान इस पद्धति को अपना चुके हैं। प्राकृतिक खेती को अपनाने पर किसानों को दोहरा लाभ मिल रहा है। एक ओर सरकार से सीधी सब्सिडी और दूसरी ओर फसलों के लिए प्रोत्साहन आधारित उच्च दाम।
प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती से तैयार फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक दरें तय की हैं। प्राकृतिक मक्की के लिए 40 रुपये, गेहूं के लिए 60 रुपये और हल्दी के लिए 90 रुपये प्रति किलोग्राम की दर निर्धारित की गई है। हाल ही में समाप्त रबी सीजन में किसानों से 96 क्विंटल प्राकृतिक गेहूं खरीदी गई, जिसकी एवज में लगभग 6 लाख रुपये की सब्सिडी सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर की जा रही है। वहीं खरीफ सीजन में 53 क्विंटल मक्की और 9 क्विंटल कच्ची हल्दी की खरीद भी की गई।
प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों को देसी गाय की खरीद पर 25 हजार रुपये, पांच हजार रुपये की परिवहन सब्सिडी, दो हजार रुपये की मंडी फीस सहायता, गौशाला फर्श निर्माण व गोमूत्र एकत्रीकरण पर आठ हजार रुपये और अन्य सामग्री जैसे ड्रम आदि के लिए 2250 रुपये तक की सब्सिडी भी मिल रही है।
किसानों को चाहिए समय पर पंजीकरण
प्राकृतिक खेती को लेकर आतमा परियोजना के निदेशक डॉ. नितिन शर्मा ने बताया कि किसान समय रहते पंजीकरण करवाएं ताकि वे सुरक्षित खाद्यान्न का उत्पादन कर उसे उच्चतम मूल्य पर बेचकर लाभ कमा सकें। उन्होंने बताया कि यह प्रणाली किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को रसायन मुक्त फसल उपलब्ध कराने की दिशा में भी मील का पत्थर है।