ये है पूरा मामला
रात करीब 11:10 बजे उन्हें लेबर रूम में शिफ्ट किया गया। प्रसव के बाद ड्यूटी पर मौजूद आया ने परिजनों को लड़का होने की सूचना दी। हालांकि, कुछ देर बाद महिला को एक नवजात बच्ची सौंप दी गई। बच्ची के कपड़े भी बदले हुए थे। परिवार ने अस्पताल कर्मचारियों के सामने आपत्ति जताई, लेकिन उनकी शिकायत पर तत्काल कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद दंपती ने निजी लैब में डीएनए जांच कराई। जांच रिपोर्ट में सामने आया कि अस्पताल से सौंपी गई बच्ची उनकी जैविक संतान नहीं है। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत डीएनए मिलान कराया गया, जिससे दोनों नवजातों के जैविक माता-पिता की पहचान हुई और शीतल को उनका बेटा वापस मिल सका। इसके बाद पीड़िता ने न्याय और मुआवजे की मांग को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।
अस्पताल की लापरवाही से झेलनी पड़ी मानसिक पीड़ा
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अस्पताल में किसी तरह की लापरवाही से इन्कार किया गया। सरकारी पक्ष ने एक महिला अटेंडेंट के बयान का हवाला देते हुए कहा कि प्रसव के दौरान किसी ने शिकायत नहीं की थी। अदालत ने सरकारी पक्ष की जांच रिपोर्ट और दलीलों को विश्वसनीय नहीं माना। कोर्ट ने पाया कि जांच रिपोर्ट में न तारीख दर्ज थी और न ही गवाहों के बयान या दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख था। गवाह यह भी नहीं बता सके कि जांच किसने और कब की थी। अदालत ने माना कि अस्पताल की लापरवाही के कारण माता-पिता अपने नवजात बच्चे के प्राकृतिक प्यार और स्नेह से लंबे समय तक वंचित रहे और उन्हें गंभीर मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी। कोर्ट ने रेस्टिट्यूटियो इन इंटीग्रम (जब किसी व्यक्ति को किसी दूसरे की गलती, लापरवाही या अपराध के कारण नुकसान उठाना पड़ता है) के सिद्धांत के तहत पीड़िता को हुए नुकसान की भरपाई जरूरी माना। इसी आधार पर अदालत ने वाद स्वीकार करते हुए हिमाचल सरकार को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।