हिमाचल की विख्यात लोक गायिका 91 वर्षीय गंभरी देवी का बिलासपुर में उनके गांव घडांलवी में मंगलवार सुबह निधन हो गया। पिछले वर्ष गंभरी देवी को राष्ट्रीय नाटक अकादमी की ओर से वर्ष 2011-12 का टैगोर सम्मान प्रदान किया गया था। वर्ष 2001 में उन्हें हिमाचल अकादमी कला सम्मान से नवाजा गया।
अकादमी के सचिव अशोक हंस ने बताया कि गंभरी देवी पिछले काफी अरसे से बीमार चल रही थीं। उनका जन्म बिलासपुर के गांव बंदला में हुआ। लगभग आठ साल की उम्र में लोक नर्तन और गायन के क्षेत्र में मंच पर उतरी गंभरी देवी का लोक गायन में जादू अपनी चरम सीमा पर पहुंचने के बाद आज भी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के कर्मचारियों ने अकादमी कार्यालय में आयोजित एक शोक सभा में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलियां देते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
गंभरी के गले के कुमार शानू भी हुए थे कायल
हिमाचली कला के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली गायिका गंभरी देवी भले ही अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन उनकी आवाज हमेशा अमर रहेगी। कुमार शानू तक उनकी आवाज के कायल थे। काफी अरसे पहले जब नलवाड़ मेले की संध्या में कुमार शानू मुख्य कलाकार थे तो लोगों की फरमाइश पर गंभरी को भी मंच पर बुलाया गया। स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण हालांकि उन्होंने चंद लाइनें सुनाई, मगर कुमार शानू भी वाह-वाह करते नहीं थके।
सामाजिक बेड़ियों की परवाह नहीं
किशोरावस्था में ही कला को बुलंदियों पर पहुंचाने का जो सिलसिला गंभरी ने शुरू किया उसे बुढ़ापे तक बरकरार रखा। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने से वह पीछे नहीं हटी। उस जमाने में महिलाओं का स्टेज पर जाना ठीक नहीं माना जाता था, लेकिन सामाजिक बेड़ियों की परवाह उन्होंने नहीं की। गंभरी ने पिस्तु उर्फ बसंता पहलवान को अपना मान लिया था। उसके साथ ही रहने लगी थी। गंभरी देवी की सहमति से ही बसंता पहलवान ने दूसरी महिला से शादी कर ली थी। गंभरी का कार्यक्रम गणेश वंदना से शुरू होता था।