प्रो. शुक्ला ने बताया कि मानसून की शुरुआत के साथ यह वेब आधारित प्रणाली प्रतिदिन भूस्खलन का पूर्वानुमान उपलब्ध कराती है। इससे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान कर प्रशासन समय पर आपदा तैयारी और राहत कार्यों की योजना बना सकता है। देश में उपलब्ध अन्य भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणालियों की तुलना में यह प्रणाली पूरे हिमालयी क्षेत्र को कवर करती है, जिससे यह देश की सबसे व्यापक प्रणालियों में शामिल हो गई है। इस प्रणाली को विकसित करने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के डाटाबेस में दर्ज करीब 26 हजार भूस्खलन घटनाओं का विश्लेषण कर भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किया गया। इसके लिए विभिन्न भूस्खलन कारकों को एंसेबंल मशीन लर्निंग मॉडल की सहायता से एकीकृत किया गया।
इसके बाद पी-रिल (वर्षा-जनित भूस्खलन की संभावना) मॉडल विकसित किया गया, जिसमें नासा ग्लोबल लैंडस्लाइड कैटलॉग और आईएमईआरजी उपग्रह वर्षा डाटा से प्राप्त सात वर्षा मानकों का उपयोग किया गया। यह मॉडल पिछले 15 दिनों के वर्षा आंकड़ों के आधार पर गतिशील पूर्वानुमान तैयार करता है। अंतिम दैनिक पूर्वानुमान भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र और पी-रिल मॉडल के संभाव्यता विश्लेषण को एकीकृत कर तैयार किया जाता है। उधर, प्रो. शुक्ला ने कहा कि उपग्रह आधारित पूर्व चेतावनी प्रणालियां आपदा जोखिम न्यूनीकरण के सबसे प्रभावी उपायों में से एक हैं, क्योंकि ये वैज्ञानिक आंकड़ों को समय पर उपयोगी निर्णयों में बदलने में मदद करती हैं। यह क्षेत्रीय स्तर का मंच विशेष रूप से मानसून के दौरान आपदा प्रबंधन एजेंसियों की तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया और समन्वय को मजबूत करेगा।
उपयोगकर्ताओं की सुविधा के लिए आईआईटी मंडी की टीम ने गूगल अर्थ इंजन आधारित वेब पोर्टल विकसित किया है। इसके माध्यम से वर्तमान दिन के साथ पिछले तीन दिनों के भूस्खलन पूर्वानुमान देखे जा सकते हैं। इसके अलावा पीडीएफ बुलेटिन डाउनलोड करने और चयनित स्थानों के लिए व्हाट्सएप अलर्ट प्राप्त करने की सुविधा भी उपलब्ध है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रणाली समय पर और स्थान-विशिष्ट चेतावनियां जारी कर भारतीय हिमालयी क्षेत्र में आपदा तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण को मजबूत करेंगी।