चंबा में मक्की की फसल पर दोहरी मार, बारिश की बेरुखी और यूरिया संकट से किसान परेशान
जिले में 30 हजार बैग की मांग के मुकाबले महज 17 फीसदी तक सप्लाई ही पहुंची
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। मौसम की मार के बीच अब खाद का संकट किसानों की मुश्किल बढ़ा रहा है। मक्की की फसल को जिस वक्त यूरिया की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसी समय चंबा के किसान खाली खाद केंद्रों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। बारिश की कमी और यूरिया की किल्लत ने खेतों में खड़ी फसल की चिंता बढ़ा दी है।
दूसरी ओर, मानसून की रफ्तार भी किसानों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रही। बारिश की कमी से खेत सूखने लगे हैं और समय पर खाद नहीं मिलने से मक्की की फसल खराब होने की आशंका गहराने लगी है। हालात ऐसे हैं कि किसान खाद केंद्रों के रोज चक्कर काट रहे हैं लेकिन हर बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। पिछले करीब साढ़े तीन महीने से जिले में यूरिया की किल्लत बनी हुई है। अब मक्की की फसल में टॉप ड्रेसिंग का सबसे अहम समय चल रहा है, तब भी खाद उपलब्ध नहीं है। यदि अगले कुछ दिनों में बारिश और यूरिया दोनों नहीं मिले तो पूरे साल की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चंबा जिले के लिए कृषि विभाग ने 30 हजार बैग यूरिया की मांग भेजी थी लेकिन अब तक केवल 17 प्रतिशत खेप ही जिले तक पहुंच पाई है। शेष सप्लाई का इंतजार किया जा रहा है।
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मक्की की फसल को अभी यूरिया चाहिए लेकिन खाद केंद्रों में ताले जैसे हालात हैं। दस बार गया, हर बार खाली हाथ लौटना पड़ा। अगर अब भी खाद नहीं मिली तो फसल बचाना मुश्किल होगा। - संजू
पहले बारिश ने साथ छोड़ दिया, अब खाद भी नहीं मिल रही। खेत सूख रहे हैं और फसल पीली पड़ने लगी है। किसान आखिर जाए तो जाए कहां। - रतन चंद
सरकार को सीजन शुरू होने से पहले खाद उपलब्ध करवा देनी चाहिए थी। जरूरत के समय खाद नहीं मिलना किसानों के साथ अन्याय है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। - विक्की कुमार
खेती ही हमारी रोजी-रोटी है। समय पर खाद नहीं मिली तो उत्पादन आधा रह जाएगा और पूरे परिवार की आय पर असर पड़ेगा। बारिश न होने से भी खेत सूखेे पड़े हैं। - घिमो राम
मक्की में यूरिया डालने का सबसे उपयुक्त समय है। सप्लाई कम आ रही है, इसलिए पूरे जिले की मांग पूरी नहीं हो पा रही। यदि किसान गोबर की खाद, जीवामृत और अन्य जैविक विकल्पों का अधिक उपयोग करेंगे तो भविष्य में रासायनिक खाद की कमी का असर कम होगा। - डॉ. भूपेंद्र सिंह, उपनिदेशक, कृषि विभाग