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हिमाचल प्रदेश: धर्मराज की कचहरी में होता है कर्मों का लेखा-जोखा, यहां यमराज के दरबार में पहुंचते हैं श्रद्धालु

Sun, 13 Sep 2026 12:45 PM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, भरमौर (चंबा)।

सार

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भरमौर स्थित चौरासी परिसर में धर्मराज का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा के कर्मों का हिसाब धर्मराज की कचहरी में होता है। यहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं।
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भरमौर का धर्मराज मंदिर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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उत्तरी भारत के प्रसिद्ध शिवधाम भरमौर में स्थित चौरासी मंदिर परिसर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि रहस्यों और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा अनोखा स्थल भी है। यहां मौजूद धर्मराज का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा इसी स्थान पर होता है और धर्मराज की कचहरी में कर्मों के आधार पर निर्णय लिया जाता है। मणिमहेश यात्रा के दौरान देशभर से भरमौर पहुंचने वाले श्रद्धालु धर्मराज के दर्शन के लिए भी मंदिर में आते हैं।

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धर्मराज मंदिर के ठीक सामने चित्रगुप्त का आसन बना हुआ है। मंदिर की सीढ़ियों के पास एक गुप्त यंत्र स्थापित होने की भी धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि इसी यंत्र के माध्यम से धर्मराज जीव के कर्मों का हिसाब रखते हैं। मंदिर के समीप बनी ढाई सीढ़ियों को स्वर्ग का द्वार माना जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इस स्थान को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं।

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धर्मराज की कचहरी में सवाल-जवाब की मान्यता
धर्मराज मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक मान्यता यह है कि यहां मृत्यु के बाद जीवात्मा के कर्मों का लेखा-जोखा होता है। कई सिद्ध पुरुषों ने धर्मराज की कचहरी में होने वाले सवाल-जवाब सुनने का दावा किया है। हालांकि, इन दावों के प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। मंदिर की धार्मिक पहचान मुख्य रूप से लोकमान्यताओं और श्रद्धालुओं की आस्था पर आधारित है।

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टेढ़े शिवलिंग से जुड़ी है मंदिर की कहानी
चौरासी मंदिर परिसर के इतिहास को दसवीं शताब्दी से भी पुराना बताया जाता है। मान्यता के अनुसार धर्मराज मंदिर वाली जगह पर पहले एक टेढ़ा शिवलिंग स्थापित था। वर्ष 1905 के बाद महाराज कृष्ण गिरि ने यहां साधना शुरू की। कुछ लोगों ने उनके साथ मिलकर शिवलिंग को सीधा करने के लिए खुदाई की, लेकिन खुदाई का अंत नहीं मिलने पर काम रोक दिया गया।

इसके बाद महाराज कृष्ण गिरि ने कई माह तक मंदिर के बाहर साधना की। कहा जाता है कि इसी दौरान उन्हें यहां धर्मराज की कचहरी होने का आभास हुआ। वर्ष 1962 में उनके देहांत के बाद उनकी समाधि मंदिर के समीप बनाई गई। यह स्थान आज भी मंदिर की धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है।

मणिमहेश यात्रा में उमड़ती है भीड़
भरमौर चंबा मुख्यालय से करीब 62 किलोमीटर दूर है। चौरासी मंदिर परिसर में 84 देवी-देवताओं के मंदिर और धार्मिक प्रतीक हैं। मणिमहेश यात्रा के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। धर्मराज मंदिर में सुबह, दोपहर और शाम आरती होती है, जबकि महाशिवरात्रि पर चारों पहर आरती की जाती है।

पुजारी पंडित रवि शर्मा और भुवनेश्वर शर्मा ने बताया कि मानव शरीर नश्वर है और व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार ही स्वर्ग-नर्क की प्राप्ति होती है। उन्होंने धर्मराज मंदिर को अद्वितीय धार्मिक स्थल बताया। पुजारियों के अनुसार बुजुर्गों से यहां मृत आत्माओं की चीखें सुनाई देने की बातें सुनने को मिलती थीं, लेकिन वर्तमान में ऐसा कोई अनुभव सामने नहीं आया है।
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