जोल गांव में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में उपस्थित लोग। स्रोत: जागरूक पाठक।
जोल गांव में श्रीमद्भागवत कथा का तीसरा दिन
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हरलोग के जोल गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन पंडित रसिक जी महाराज ने कहा कि अटूट संकल्प और भक्ति से भगवान को भी वश में किया जा सकता है। इस अवसर पर उन्होंने भक्त प्रहलाद की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि बालक प्रहलाद की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है।
प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप दैत्यों के राजा थे। वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानते थे, लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब यह बात हिरण्यकश्यप को पता चली तो उसने प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए, लेकिन फिर भी प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति कम न हुई। अंत में स्वयं भगवान विष्णु प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए। नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया और प्रहलाद को अपनी गोद में बैठा कर प्रेम किया। इस दौरान उन्होंने नारद जी की कथा, समुद्र मंथन, कदम देहुती संवाद और कपिल मुनि के ज्ञान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों का आज भी काफी महत्व है, लेकिन यह सभी 14 चीजें शुभ नहीं थी। समुद्र मंथन से कुछ अशुभ चीजें भी निकली थीं। उन्होंने कहा कि एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन यानी धन, वैभव और ऐश्वर्य से विहीन हो गया था, तब विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का उपाय बताया। विष्णु ने कहा कि समुद्र मंथन से जो अमृत कलश प्राप्त होगा, उससे आप सभी अमर हो जाएंगे। समुद्र मंथन से निकली अशुभ चीजें हलाहल विष निकला था। इस विष की ज्वाला इतनी तीव्र थी कि सभी देवता और दानव जलने लगे तब भगवान शिव देवता, दानव और समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए इसे खुद पी गए। विष की तीव्र जलन के कारण शिवजी का कंठ नीला पड़ गया और उनके शरीर का ताप बढ़ने लगा। इसलिए शिवजी का एक नाम नीलकंठ भी पढ़ा। कथा समापन पर भजन कीर्तन का आयोजन किया गया और लोगों को प्रसाद बांटा गया।