संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिला भाषा एवं संस्कृति विभाग बिलासपुर और व्यास रंगमंच संस्था के संयुक्त तत्वावधान में बहुउद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में बंगाल के प्रसिद्ध नाटक पाखिर ओंतिम नृत्यो का मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से स्वतंत्रता, संघर्ष, बंधनों से मुक्ति और मानवीय गरिमा जैसे विषयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय, मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था ने प्रस्तुति को जीवंत बना दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने की। नाटक का शुभारंभ बिलासपुर के रंगकर्मियों ने किया। व्यास रंगमंच संस्था की ओर से नाटक की तैयारियां की गई थीं। इसका निर्देशन जिले की प्रख्यात रंगकर्मी शिवांगी रघु ने किया। लाइट संयोजन अभिषेक डोगरा और तकनीकी सहयोग प्रिंस शर्मा ने दिया। संस्था की ओर से कार्यक्रम में पहुंचे अतिथियों का स्वागत किया गया।
नाटक की कहानी देवदासी प्रथा की पृष्ठभूमि पर आधारित रही। नायिका को बचपन में ही धार्मिक रीति-रिवाज और अंधविश्वास के नाम पर भगवान की दुल्हन बनाकर मंदिर को समर्पित कर दिया जाता है। इसके बाद उसका पूरा जीवन मंदिर में नृत्य और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित हो जाता है। धीरे-धीरे उसे आस्था की आड़ में होने वाले शोषण का एहसास होता है। नायिका के लिए मंदिर पवित्र स्थान के बजाय बंधन का प्रतीक बन जाता है। वह इस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का फैसला करती है। इसी दौरान उसे जमींदार के बेटे से प्रेम हो जाता है, जो उसका साथ देता है। हालांकि जमींदार के लोग उसके प्रेमी की हत्या कर देते हैं। प्रेमी की मौत के बाद नायिका शोषणकारी व्यवस्था के सामने झुकने के बजाय मृत्यु को गले लगा लेती है। नाटक में उसकी मृत्यु को आत्मा की अंतिम मुक्ति के रूप में दिखाया गया। नायिका का अंतिम नृत्य मनोरंजन नहीं, बल्कि बंधनों के खिलाफ उसकी आवाज और स्वतंत्रता की पुकार बनकर सामने आया। इस अवसर पर सेवानिवृत्त जॉइंट डायरेक्टर सुशील पुंडीर, गजल गायक नरेंद्र दत्त, पत्रकार एवं रंगकर्मी अरुण डोगरा, रीतू, फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट वेलफेयर के जिला अध्यक्ष कश्मीर ठाकुर और अभिषेक सोनी समेत अन्य मौजूद रहे।
जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने कहा कि भाषा एवं संस्कृति विभाग प्रदेश की समृद्ध कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। रंगमंच के माध्यम से स्थानीय कलाकारों को मंच देने के साथ दर्शकों को देश की विभिन्न नाट्य परंपराओं से परिचित करवाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस नाटक ने देवदासी प्रथा, महिलाओं की स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और धार्मिक आस्था की आड़ में होने वाले शोषण जैसे गंभीर विषयों पर दर्शकों को सोचने का अवसर दिया।
जिला भाषा एवं संस्कृति विभाग के बहुउद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में बंगाल के प्रसिद्ध नाटक का मंचन