कीरतपुर-नेरचौक सड़क बनने से कस्बा कटा
बस अड्डे पर सन्नाटा, पलायन को मजबूर हुए दुकानदार
लाल चंद भारद्वाज
स्वारघाट (बिलासपुर)। विकास की तेज रफ्तार कई बार अपने पीछे गंभीर सामाजिक और आर्थिक असर भी छोड़ जाती है। हिमाचल का प्रवेश द्वार और बिलासपुर-सोलन जिले की सीमा पर स्थित ऐतिहासिक स्वारघाट कस्बा इसका उदाहरण बन गया है। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन के शुरू होने के बाद यह कस्बा मुख्य यातायात से कट गया है। इससे यहां के व्यापार और गतिविधियों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वारघाट कभी चौबीसों घंटे व्यापारिक गतिविधियों से गुलजार रहता था, अब वह वीरान नजर आने लगा है।
स्वारघाट क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। यहां की थोक दुकानों से आसपास के गांवों और छोटे बाजारों की दुकानों को राशन और अन्य जरूरी सामग्री की सप्लाई होती थी। पुराने नेशनल हाईवे से गुजरने वाले वाहनों की आवाजाही के कारण यहां के ढाबों, होटलों और जनरल स्टोरों को भी अच्छा कारोबार मिलता था। अब मुख्य यातायात फोरलेन पर शिफ्ट होने के बाद यहां के कारोबार में भारी गिरावट आई है। सबसे ज्यादा असर बड़े दुकानदारों पर पड़ा है, जिनकी आय में उल्लेखनीय कमी आई है। कामकाज कम होने के कारण कुछ दुकानदार अन्य स्थानों की ओर रुख कर चुके हैं, जिसे स्थानीय लोग चिंता का विषय मान रहे हैं।
स्वारघाट का बस अड्डा, जो कभी सवारियों और बसों की आवाजाही से व्यस्त रहता था, अब काफी शांत नजर आता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई सरकारी और निजी बसें पुराने रूट से गुजरने के बजाय सीधे फोरलेन से जा रही हैं। इससे आम लोगों को आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सुबह और शाम स्कूल के बच्चों की आवाजाही के समय कुछ गतिविधि दिखाई देती है, लेकिन बाकी समय बस अड्डा काफी शांत रहता है।
पर्यटन मानचित्र से ओझल हो रहा हिल टॉप
स्वारघाट की प्राकृतिक सुंदरता ने इसे लंबे समय तक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाए रखा। यहां आने वाले कई पर्यटक स्वारघाट में रुकना पसंद करते थे। इसके कारण पर्यटन विकास निगम का हिल टॉप होटल अक्सर पर्यटकों से भरा रहता था। अब पर्यटकों की आवाजाही कम होने से होटल का संचालन भी प्रभावित हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन गतिविधियों में आई कमी से यहां की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है।
नगर पंचायत के निर्णय पर उठे सवाल
प्रदेश सरकार ने हाल ही में स्वारघाट को नगर पंचायत बनाने की अधिसूचना जारी की है। कुछ स्थानीय लोगों ने इस निर्णय पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब व्यापार पहले ही प्रभावित हो चुका है और कई दुकानदार यहां से जा चुके हैं, तो ऐसे समय में नगर पंचायत बनने से टैक्स का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। लोगों का मानना है कि कस्बे की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इस विषय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
सिमटते व्यापार से पलायन की चिंता
स्वारघाट कभी व्यापारिक हब हुआ करता था, लेकिन फोरलेन बनने के बाद यहां के व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। पुराने मार्ग पर बसें न चलने से कारोबार लगातार घटता जा रहा है। कई दुकानदार पलायन कर चुके हैं, जो चिंता का विषय है।
-अजय ठाकुर, प्रधान, व्यापार मंडल स्वारघाट
अब सुबह की सैर की बन चुका जगह
एक समय था जब स्वारघाट में मेले जैसी रौनक रहती थी। अब न वैसी चहल-पहल रही और न व्यापार। स्वारघाट अब मुख्य रूप से सुबह की सैर करने वालों का स्थान बनकर रह गया है। नगर पंचायत बनाने का निर्णय मौजूदा परिस्थितियों में उचित नहीं लगता।
-राममूर्ति धर्माणी, वरिष्ठ नागरिक एवं पूर्व व्यवसायी
घट चुका कारोबार
कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन बनने के बाद यहां का कारोबार काफी कम हो गया है। कुछ छोटे दुकानदार अपनी दुकानें बंद कर अपने गांवों को लौट चुके हैं। यह स्वारघाट के भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
-रोशन लाल ठाकुर, वरिष्ठ नागरिक एवं व्यवसायी
परिवहन व्यवस्था की अनदेखी
स्वारघाट की स्थिति चिंताजनक है। बसें निर्धारित रूट से न जाकर फोरलेन से चल रही हैं। इससे लोगों को घंटों बसों का इंतजार करना पड़ता है। जो कस्बा कभी काफी प्रसिद्ध था, वहां अब गतिविधियां कम हो गई हैं।
-बालकृष्ण ठाकुर, पूर्व प्रधान, ग्राम पंचायत कुटेहला
अजय ठाकुर अध्यक्ष व्यापार मंडल स्वारघाट
अजय ठाकुर अध्यक्ष व्यापार मंडल स्वारघाट
अजय ठाकुर अध्यक्ष व्यापार मंडल स्वारघाट
अजय ठाकुर अध्यक्ष व्यापार मंडल स्वारघाट