अगर जिला की पंचायतों, जिप और बीडीसी चुनाव में आपसी सहमति से उम्मीदवारों का चयन हुआ होता तो क्षेत्र के विकास के लिए लाखों रुपये की रकम मिलती।
इससे ग्रामीण क्षेत्रों की जनता को सड़कें, पेयजल स्कीमों सहित सिंचाई सुविधा मिल सकती थी। बावजूद इसके जिला में एक भी पंचायत निर्विरोध नहीं चुनीं गई। ऐसे में जिला की जनता इस बार भी सरकार की योजना का लाभ उठाने में महरूम रह गई। ऐसा ही हाल बीडीसी और जिला परिषद का भी है।
इससे पंचायत सहित बीडीसी और जिला परिषद निर्विरोध बनने से मिलने वाली राशि भी हाथ से जाती रही। हालांकि जिला की दो पंचायतों में प्रधान निर्विरोध चुने गए।
लेकिन वहां पर भी पूरी पंचायत निर्विरोध नहीं बन पाई। सरकार ने हिमाचल प्रदेश में सर्वसम्मति से पंचायतों को चुने जाने पर 10 लाख रुपये मिलते हैं। जबकि बीडीसी वार्ड निर्विरोध आने पर पांच लाख और सर्वसम्मति से जिला परिषद चुनने पर 15 लाख रुपये दिए जाने थे।
लेकिन 21 दिसंबर (सोमवार) को नाम वापस लेने के अंतिम दिन सभी पंचायतों में उतरने वाले उम्मीदवारों की तस्वीर साफ हो गई। इसमें जिला की 151 पंचायतों में से कोई भी पंचायत निर्विरोध नहीं चुनी गई।
जबकि 97 बीडीसी वार्डों में से किसी पर भी सहमति नहीं बन पाई। ऐसा ही हाल जिला के 14 जिला परिषद वार्डों का भी रहा। जिला परिषद वार्डों में भी सर्वसम्मति न बनने से 15 लाख रुपये की इनाम राशि भी हाथ से जाती रही।
पंचायतों में प्रधान पद के लिए 728 दावेदार रह गए हैं। जबकि उपप्रधान पद के लिए 875 के बीच मुकाबला होगा। चार ब्लॉकों में बीडीसी के लिए 399 प्रत्याशी तथा जिला परिषद के 14 वार्डों में 78 दावेदार चुनावी रण में हैं।