पति विदेश में, पत्नी ने चलाया केस, पावर ऑफ अटॉर्नी नहीं मिली तो अदालत ने खारिज की रोक की अर्जी
पड़ोसियों पर जमीन में दखल और निर्माण की कोशिश के लगाए थे आरोप
अदालत ने कहा, अधिकार पत्र के बिना पति की ओर से कार्यवाही चलाने का आधार नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। सिविल जज कोर्ट नंबर-3 घुमारवीं ने भलस्वाय क्षेत्र की जमीन से जुड़े विवाद में अंतरिम निषेधाज्ञा की अर्जी खारिज कर दी। विदेश में रह रहे पति की ओर से पत्नी ने पड़ोसियों पर जमीन में दखल देने, खोदाई कर निर्माण की तैयारी करने और जमीन का स्वरूप बदलने की आशंका जताते हुए अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान अदालत में पति की ओर से पत्नी को मुकदमा चलाने के लिए अधिकृत करने वाला कोई पावर ऑफ अटॉर्नी या अन्य अधिकार पत्र पेश नहीं किया जा सका।
अर्जी में पत्नी की ओर से आरोप लगाया था कि पड़ोसी जमीन में हस्तक्षेप कर रहे हैं और खोदाई कर निर्माण करना चाहते हैं। डंगे और जमीन की सीमाओं को नुकसान पहुंचाने तथा जमीन का स्वरूप बदलने की आशंका भी जताई थी। दूसरी ओर, पड़ोसियों ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उनकी गतिविधियां अपनी जमीन तक सीमित हैं। उन्होंने उलटे पत्नी पर उनकी जमीन में दखल देने, सीमा विवाद पैदा करने, गंदा पानी उनकी जमीन और घर की ओर मोड़ने तथा सीमा चिह्न उखाड़ने के आरोप लगाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बिंदु की जांच की कि विदेश में रह रहे पति की ओर से पत्नी को अदालत में कार्यवाही करने का अधिकार किस आधार पर मिला। रिकॉर्ड की जांच में पति की ओर से पत्नी को अधिकृत करने वाला विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी, सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी, अधिकार पत्र या अन्य दस्तावेज नहीं मिला।
अदालत ने कहा कि केवल पति-पत्नी का रिश्ता होने से पत्नी अपने आप पति की अधिकृत प्रतिनिधि नहीं बन जाती। यदि कोई व्यक्ति स्वयं अदालत में उपस्थित नहीं है और उसकी ओर से कोई दूसरा व्यक्ति कार्यवाही कर रहा है तो उसके अधिकार को साबित करने वाला दस्तावेज रिकॉर्ड पर होना चाहिए।
अदालत ने अंतरिम निषेधाज्ञा के लिए आवश्यक तीन आधारों -प्रथम दृष्टया मामला, अपूरणीय क्षति की आशंका और सुविधा का संतुलन - का भी उल्लेख किया। अदालत ने पाया कि पत्नी के पास पति की ओर से कार्यवाही करने का अधिकार साबित करने वाला दस्तावेज नहीं था। ऐसे में प्रथम दृष्टया मामला साबित नहीं हुआ। इसके आधार पर अंतरिम रोक की अर्जी खारिज कर दी गई।
सिविल जज कोर्ट नंबर-3, घुमारवीं ने 30 सितंबर को खुले न्यायालय में आदेश सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अंतरिम अर्जी के निपटारे तक सीमित रहेंगी और मुख्य दीवानी वाद के अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेंगी। अर्जी को मुख्य दीवानी वाद की फाइल के साथ संलग्न करने के निर्देश दिए गए हैं।