एचपी लोक निर्माण विभाग शाहपुर ने प्रोजेक्ट डायरेक्टर मंडी को भेजा पत्र
प्रभावितों की शिकायत पर कार्रवाई करने को कहा
भूमि अधिग्रहण और पैमाइश प्रक्रिया में अनियमितताओं की है शिकायत
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक-पंडोह से कुल्लू-मनाली तक फोरलेन निर्माण में अधिग्रहित भूमि की पैमाइश को लेकर उठे विवाद को एनएचएआई के पास भेज दिया गया है। हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग के नेशनल हाईवे सर्किल शाहपुर के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर ने पत्र जारी कर एनएचएआई के प्रोजेक्ट डायरेक्टर, पीआईयू मंडी को यह मामला आवश्यक कार्रवाई के लिए अग्रेषित किया है। पत्र में बताया गया है कि यह कार्रवाई मुख्य अभियंता (राष्ट्रीय राजमार्ग) शिमला-2 के 7 मार्च 2026 के पत्र के संदर्भ में की गई है।
मुख्य अभियंता कार्यालय को फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावितों की ओर से एक शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसमें भूमि अधिग्रहण और पैमाइश प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायत है। इसी शिकायत की प्रति शाहपुर सर्किल के माध्यम से एनएचएआई को भेजी गई है। लोक निर्माण विभाग ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि संबंधित सड़क अब एनएचएआई को फोरलेन निर्माण के लिए हस्तांतरित की जा चुकी है, इसलिए इस विषय पर आगे की कार्रवाई एनएचएआई की ओर से ही की जानी अपेक्षित है। साथ ही प्रोजेक्ट डायरेक्टर मंडी से कहा गया है कि शिकायत में उठाए गए बिंदुओं का परीक्षण कर उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें। इस पत्र की प्रति मुख्य अभियंता (एनएच) शिमला-2 को सूचना के लिए शिकायतकर्ता को भी भेजी गई है। इसके बाद यह साफ हो गया है कि फोरलेन परियोजना में भूमि पैमाइश और उससे जुड़े विवादों पर अब निर्णायक कार्रवाई एनएचएआई स्तर पर ही होगी। शिकायत है कि फोरलेन परियोजना में अधिग्रहित भूमि की पैमाइश के लिए लोक निर्माण विभाग के तीन बेलदार (चेनमैन) नियुक्त किए थे। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि ये कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचे, जिससे पूरी पैमाइश प्रक्रिया संदिग्ध हो गई है। पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार की टूर डायरी में फील्ड विजिट, यात्रा और रात्रि ठहराव का भुगतान दर्ज है, लेकिन पैमाइश टीम के बेलदार के आने-जाने या ठहरने से संबंधित कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। इससे यह सवाल उठ रहा है कि यदि वे मौके पर नहीं गए तो जमीन की माप कैसे की गई।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि परियोजना का मूल भूमि अधिग्रहण प्लान संबंधित उपमंडलों को उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके अलावा सड़क की एक्वायर्ड विड्थ तय करने, पिलर लगाने और तकनीकी माप (पिलर-टू-पिलर डिस्टेंस, बैक/फ्रंट बियरिंग) से जुड़े आवश्यक निशान भी पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं कराए गए। यह भी मांग उठाई गई है कि पहले यह स्पष्ट किया जाए कि परियोजना में कुल कितनी भूमि अधिग्रहित की गई, कितनी शेष है और कितनी वास्तविक आवश्यकता थी। साथ ही यह भी जांच हो कि कितनी भूमि ग्रीनफील्ड और कितनी ब्राउनफील्ड श्रेणी में आती है। अब मुख्य अभियंता द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने और मामला एनएचएआई को भेजे जाने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और प्रभावितों को राहत मिलती है या नहीं।