जोल गांव में चल रही श्रीमद भागवत कथा में उपस्थित श्रद्धालु। स्रोत: जागरूक पाठक।
राजा परीक्षित की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु
जोल गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का दूसरा दिन
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हरलोग के जोल गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक पंडित रसिक जी महाराज ने कहा कि जीवन की महान सच्चाई मौत है। कोई भी जीव इससे बच नहीं सका है।
संसार में जो भी जीव आता है। उसे संसार छोड़कर अवश्य जाना पड़ता है। इस दौरान उन्होंने राजा परीक्षित की कथा सुनाई। जब भागवत कथा सुनाते हुए शुकदेव को छह दिन बीत गए व उनकी मृत्यु में बस एक दिन शेष रह गया, लेकिन राजा का शोक एवं मृत्यु का भय कम नहीं हुआ तब शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया और रास्ता भटक गया। रात होने पर वह आसरा ढूंढने लगा, उसे एक झोपड़ी दिखी, जिसमें एक बीमार बहेलिया रहता था। उसने झोपड़ी में ही एक ओर मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था और अपने खाने का सामान झोपड़ी की छत पर टांग रखा था। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका पर कोई और आश्रय न देख उसने बहेलिए से झोपड़ी में रातभर ठहरा लेने की प्रार्थना की। बहेलिया बोला कि मैं राहगीरों को अक्सर ठहराता रहा हूं, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वह झोपड़ी छोड़ना ही नहीं चाहते। इसलिए आपको नहीं ठहरा सकता। राजा ने उसे वचन दिया कि वह ऐसा नहीं करेगा। सुबह उठते-उठते उस झोपड़ी की गंध में राजा ऐसा रच बस गया कि वहीं रहने की बात सोचने लगा। इस पर उसकी बहेलिए से कलह भी हुई। वह झोपड़ी छोड़ने में भारी कष्ट और शोक का अनुभव करने लगा। कथा सुनाकर शुकदेव ने परीक्षित से पूछा क्या उस राजा के लिए यह झंझट उचित था। परीक्षित ने कहा वह तो बड़ा मूर्ख था, जो अपना राज काज भूलकर दिए हुए वचन को तोड़ना चाहता था। वह राजा कौन था, तब शुकदेव ने कहा कि परीक्षित वह तुम स्वयं हो। इस मल-मूत्र की कोठरी देह में तुम्हारी आत्मा की अवधि पूरी हो गई। अब इसे दूसरे लोक जाना है, पर तुम झंझट फैला रहे हो। क्या यह उचित है। यह सुनकर परीक्षित ने मृत्यु के भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से तैयारी कर ली और अंतिम दिन का कथा श्रवण पूरे मन से किया। परीक्षित का विवाह उत्तर के राजकुमार की बेटी इरावती से हुआ। इरावती और परीक्षित के चार बेटे हुए जिनमें एक जनमेजय था। परीक्षित ने गंगा नदी के किनारे चार अश्वमेध यज्ञ किए थे। शिक्षा ग्रहण करने के बाद परीक्षित ने शुकदेव से कहा कि अब उन्हें सांपों के काटने का कोई डर नहीं है। उन्होंने आत्मा और ब्रह्म की प्रकृति को जान लिया है। जब शुकदेव चले गए तो परीक्षित ने बैठकर ध्यान लगाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उस काल के प्रचलित नाग वंश तक्षक का एक नाग ब्राह्मण की वेशभूषा में उनके नजदीक आया। उन्होंने परीक्षित को काट खाया और इससे परीक्षित की मौत हो गई।