घुमारवीं में 1990 से किराये के भवन में चल रहा परियोजना का कार्य
कार्यालय से 322 आंगनबाड़ी केंद्रों को किया जाता है संचालित
संवाद न्यूज एजेंसी
घुमारवीं (बिलासपुर)। महिलाओं और बच्चों का भविष्य किसी भी समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होता है। इन्हीं नन्ही जिंदगियों की देखभाल, पोषण और संरक्षण के उद्देश्य से बाल विकास परियोजना जैसी योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन जब इन योजनाओं को चलाने वाला कार्यालय ही वर्षों से उपेक्षा का शिकार हो, तो यह केवल व्यवस्था की कमी नहीं बल्कि संवेदनशीलता के अभाव का संकेत बन जाता है। घुमारवीं स्थित बाल विकास परियोजना अधिकारी कार्यालय की स्थिति इसी पीड़ा को उजागर करती है।
35 वर्षों से यह कार्यालय अपने स्वयं के भवन के लिए भटक रहा है। वर्ष 1990 में शुरू की गई इस परियोजना को यह कहकर किराये के कमरों में स्थापित किया गया था कि जल्द ही सरकारी भवन उपलब्ध करवा दिया जाएगा। इन 35 वर्षों में छह सरकारें बदलीं, अनेक जनप्रतिनिधि आए और गए, लेकिन किसी ने भी महिलाओं और बच्चों से जुड़े इस अहम कार्यालय को एक ढंग की छत देना जरूरी नहीं समझा। सरकारों की प्राथमिकताएं मंचों और घोषणाओं तक सीमित रहीं, जबकि जमीनी हकीकत लगातार बदतर होती चली गई। आज हालात यह हैं कि करीब 322 आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन मात्र चार कमरों के छोटे से दफ्तर से किया जा रहा है। इन्हीं चार कमरों में 322 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, 322 सहायिकाएं, 14 सुपरवाइजर और 7 कार्यालय कर्मचारी किसी तरह व्यवस्था संभाल रहे हैं। यह व्यवस्था नहीं, बल्कि सिस्टम की बदहाली का खुला प्रदर्शन है। इससे भी अधिक शर्मनाक तथ्य यह है कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए सरकार द्वारा भेजे जाने वाले न्यूट्रिशन सप्लीमेंट को रखने के लिए आज तक कोई गोदाम उपलब्ध नहीं कराया गया। मजबूरी में हर महीने यह सामग्री आंगनबाड़ी केंद्रों में रखवाई जाती है और वहीं से 322 अलग-अलग स्थानों पर वितरण किया जाता है। हर माह गर्भवती महिलाओं और कुपोषित बच्चों को पोषाहार देने के लिए इसी छोटे से कार्यालय में भीड़ जुटती है। सीमित जगह, अव्यवस्था और संसाधनों की भारी कमी में कर्मचारी मानसिक दबाव झेलने को मजबूर हैं। यदि इतने बड़े स्तर पर संचालित परियोजना का कार्यालय ही इस हालत में है, तो गांवों में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
कोट
घुमारवीं में निर्माणाधीन मिनी सचिवालय में बाल विकास परियोजना कार्यालय के लिए स्थान उपलब्ध करवाने को लेकर बात हुई है। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर, जब तक मिनी सचिवालय का भवन तैयार नहीं हो जाता, तब तक उप कोषागार कार्यालय के पुराने भवन में कार्यालय को स्थान दिए जाने की संभावना है।
हरीश मिश्रा, जिला परियोजना अधिकारी बिलासपुर