वर्तमान में हिमाचल के अस्पतालों में किसी गंभीर संक्रमण (जैसे दिमागी बुखार या सेप्सिस) की सटीक पहचान के लिए सैंपल को अक्सर बाहरी लैब या चंडीगढ़ स्थित पीजीआई भेजना पड़ता है। वहां से रिपोर्ट आने में तीन से सात दिन लग जाते हैं। कई बार जब तक रिपोर्ट आती है, संक्रमण मरीज के अंगों को नुकसान पहुंचा चुका होता है। एम्स में यह मशीन लगने के बाद यह पूरी प्रक्रिया कैंपस के अंदर ही सिमट जाएगी। इस मशीन की कार्यप्रणाली को विशेषज्ञों ने सिंड्रोमिक टेस्टिंग का नाम दिया है। इसके मुख्य फायदे यह हैं कि एक ही जांच में 22 बीमारियों का स्कैन होगा।
अगर किसी मरीज को तेज बुखार है, तो डॉक्टर को यह समझ नहीं आता कि यह मलेरिया है, डेंगू है, स्वाइन फ्लू है या कोई घातक बैक्टीरिया। पुरानी तकनीक में सबके लिए अलग-अलग टेस्ट होते थे। फिल्म ऐरे मशीन एक ही सैंपल से 22 से ज्यादा संभावित वायरस और बैक्टीरिया को एक साथ स्कैन कर लेती है। आईसीयू के मरीजों के लिए वरदान है। सेप्सिस (खून में जहर फैलना) के मामले में हर एक घंटा मरीज की मृत्यु दर को आठ फीसदी तक बढ़ा देता है। यह मशीन मात्र 60 मिनट में बता देगी कि संक्रमण किस कीटाणु से है, जिससे गोल्डन ऑवर में ही सही इलाज शुरू हो सकेगा। आजकल अंदाजे से दवा देने के कारण मरीजों के शरीर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ रहा है। यह मशीन बताएगी कि मरीज को एंटी-वायरल चाहिए या एंटी-बैक्टीरियल। इससे मरीज को बेवजह की भारी भरकम दवाइयां नहीं खानी पड़ेंगी, जिससे लीवर और किडनी सुरक्षित रहेंगे।