विवादों के संत आसाराम हिमाचल में भी विवादित रहे हैं। वर्ष 2010 की मणिमहेश यात्रा के दौरान उन्होंने भोले बाबा के भक्तों की आस्था से भी खिलवाड़ किया था।
उस दौरान भी वे एक विदेशी शिष्या को लेकर विवाद में थे। इससे बचने के लिए वे हेलीकाप्टर से धनछो आए थे।
तब लोगों से घिरे रहने वाले संत के स्वागत में नाममात्र भक्त ही उमड़े थे। बताया जाता है कि वे हजारों शिव भक्तों की मणिमहेश में आस्था को देख इतने परेशान हो गए कि यह तक कह दिया था कि यहां न तो मणि है और न ही महेश हैं। मणि तो उनके पास है।
उस दौरान धनछो से डलझील की चढ़ाई चढ़ते समय कुछ ही दूरी पर उनकी सांसें फूल गई थीं। तब उन्होंने हताशा में यह विवादित टिप्पणी की थी। धार्मिक आस्थाओं को तार-तार करने वाली इस टिप्पणी के बाद शिवभक्तों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था।
उस दौरान पुलिस की सुरक्षा में जैसे-तैसे उन्हें यहां से निकाला गया था, मगर शिवभक्तों ने उनके खिलाफ भरमौर और चंबा में जोरदार विरोध प्रदर्शन किए और उनके पुतले जलाए। शिव भक्तों का यह गुस्सा आज भी ठंडा नहीं पड़ा है।
महामंडलेश्वर उपाधि हासिल करने वाले आसाराम के अपने ही अखाड़े के संत उज्जैन निवासी बाबा कालगिरि का कहना है कि आसाराम महज कथा वाचक हैं। वे योगी नहीं बल्कि गृहस्थ जीवन जीने वाले आम व्यक्ति हैं।
वहीं आसाराम का भरमौर में पुतला फुंक कर प्रदर्शन करने वाले सनातन धर्म मठ मंदिर सुरक्षा समिति के प्रदेशाध्यक्ष विरेंद्रानंद गिरि ने कहा कि आसाराम जैसों को जेल ही मिलती है।
उन्होंने कहा कि मणिमहेश पर टिप्पणी के दौरान अगर आसाराम भागे न होते तो शिवभक्त उनके साथ कुछ भी गलत कर सकते थे। ब्राह्मण प्रतिनिधि सभा चंबा के अध्यक्ष विनय शर्मा ने बताया कि गलत टिप्पणियां व व्यवहार के कारण आसाराम पहले भी विवादों से घिरे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि दुष्कर्म के आरोप एक संत के लिए ये शर्मनाक बात है। उन्होंने बताया कि चंबा में आज भी उनके खिलाफ रोष है।
चंबा थाने में दी गई थी शिकायत
मणिमहेश पर टिप्पणी करने पर आसाराम के खिलाफ सदर थाना में शिकायत पत्र देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। हालांकि, तब सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई थी।
शिकायतकर्ताओं में शामिल वकील जयसिंह ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि उस दौरान सैकड़ों लोगों ने आसाराम का विरोध किया था और उनका पुतला फूंका गया था। उन्होंने शिव भक्तों की आस्था पर प्रहार किया था।