इस दुर्गम गांव से सभी ग्रामीण वर्षों पहले पलायन कर चुके हैं। आज गांव का अस्तित्व केवल कागजों तक सीमित है। कई वर्ष पहले सुविधाओं के अभाव के चलते ग्रामीणों ने पंचायत से नाम कटवाकर राशन कार्ड तक बदलवा डाले। वर्तमान में ग्राम पंचायत नकड़ोह और रामनगर के बशिंदे होकर रह गए हैं। मुख्य कस्बे से भले ही 15 किलोमीटर दूरी पर यह दुर्गम क्षेत्र में गांव है। जहां के लिए दौलतपुर चौक से तो कच्चा मार्ग लिंक करता है, लेकिन दूसरी ओर चिंतपूर्णी से मार्ग के बीच में इस गांव के लिए नाले की खाई होने के चलते संपर्क नहीं बन पाया है। इस संदर्भ में मनरेगा लोकपाल ने स्थिति की रिपोर्ट तैयार करके सरकार को भेजी है।
दूसरी ओर दो साल पहले पलायन कर चुके शिकायतकर्ता की शिकायत के आधार पर जब विभाग की ओर से अधिकारी वहां पर पहुंचे, तो गांव में कोई भी ग्रामीण नजर नहीं आया। चारों ओर उजड़े आशियाने ही दिखे। अब भले ही यहां पर सार्वजनिक शौचालय, स्ट्रीट लाइट समेत अन्य सुविधाओं की व्यवस्था कर दी है, लेकिन उनका लाभ उठाने वाला कोई भी ग्रामीण नजर नहीं आया। विभाग की रिपोर्ट के अनुसार यहां पर कोई भी ग्रामीण जीवन बसर करता नजर नहीं आया है। पंचायत की ओर से भी प्रतिनिधि और अधिकारी जब मतदान के दौरान क्षेत्र में गए, तो भी ग्रामीण नहीं दिखा। मनरेगा लोकपाल ऊना रमेश गौतम का कहना है कि दुर्गम गांव में सार्वजनिक शौचालय, स्ट्रीट लाइट, पक्के रास्ते, तलाब समेत अन्य सुविधाएं तो देखी गईं, लेकिन गांव में कोई ग्रामीण नजर नहीं आया।
उपायुक्त ऊना जतिन लाल का कहना है कि जल्द ही संबंधित क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों से फीडबैक जुटाई जाएगी। जो भी व्यवस्था होगी, गांव का नए सिरे से बसाने को लेकर लोगों को प्रेरित किया जाएगा। प्रशासन की ओर से कार्रवाई की जाएगी।