मंगलवार को राठौर ने कहा कि हिमाचल की करीब पांच हजार करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ती लागत, महंगी मजदूरी और घटते उत्पादन के दबाव में है। ऐसे में एप्पल स्कैब, मार्सोनिना और अल्टरनेरिया जैसी बीमारियों के साथ घटिया दवाओं की शिकायतें बागवानों की परेशानी बढ़ा रही हैं और विभाग को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। राठौर ने विदेशों से आने वाली दवाओं, नर्सरी और पौध सामग्री को लेकर केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा कि केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड दवाओं को प्रमाणित करता है। विदेशों में प्रतिबंधित दवाओं के यहां इस्तेमाल और उनकी गुणवत्ता की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने फर्जी क्वारंटीन प्रमाणपत्रों, विदेशों में अप्रचलित किस्मों के हिमाचल आने और अज्ञात वायरस के देश में पहुंचने की आशंका जताते हुए सवाल किया कि कहीं वायरस जानबूझकर फैलाने के पीछे कोई बड़ी विदेशी साजिश तो नहीं हो रही। विदेशी पौध सामग्री की गुणवत्ता, प्रमाणपत्र और वायरस की वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
राठौर ने सेब को लंबोतरा आकार और अच्छा रंग देने के लिए इस्तेमाल किए गए पीजीआर पर सवाल उठाते हुए कहा कि विदेशी कंपनी का यह उत्पाद करीब 16 हजार रुपये प्रति लीटर तक बिका।इसके इस्तेमाल से कई जगह सेब झड़ने की शिकायत आई और इसमें यहां छेड़छाड़ या मिलावट की आशंका है। मामले की जांच सतर्कता विभाग को दी गई है, जिसकी समयबद्ध जांच और दोषी फर्मों व आपूर्तिकर्ताओं पर कार्रवाई की मांग की गई। वहीं, नेगी ने कहा कि पीजीआर का इस्तेमाल बड़े बागवान पहले से करते रहे हैं और शुरुआत में इससे अच्छे गुणवत्तापूर्ण फल भी आए, लेकिन अब नकली पीजीआर से बागवान धोखा खा रहे हैं।
संभव है कि कुछ बड़े बागवान इसकी तस्करी भी करते रहे हों। राठौर ने नौणी विश्वविद्यालय के छिड़काव कार्यक्रम में शामिल दवाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि मार्सोनिना और अल्टरनेरिया जैसी बीमारियां सामने आ रही हैं। केंद्रीय प्रमाणन व्यवस्था की भी जांच होनी चाहिए। इस पर मंत्री ने कहा कि दवाओं का प्रमाणन केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड करता है और बाजार में कंपनियां बागवानों को कई तरह की दवाओं के लिए आकर्षित करती हैं, लेकिन बिना प्रयोग के दवा इस्तेमाल करने से नुकसान हो सकता है। मंत्री ने माना कि काफी पौध सामग्री बाहर से लानी पड़ रही है और कई कंटेनर वापस भेजे जा चुके हैं। नेगी ने कहा कि सरकार खुद नर्सरी तैयार कर रही है।