हिमाचल की ऐतिहासिक धरोहर शिमला-कालका रेलवे ट्रैक खतरे की जद में है। 1905 में बने इस ट्रैक के किनारों पर बेतरतीब भवन निर्माण और खनन से ट्रैक की सुरक्षा पर सवाल खड़ा हो गया है।
बरसात के मौसम में भूस्खलन से ट्रैक का बाधित होना आम बात हो गई है। ऐसे में ट्रैक की भारक क्षमता और सैलानियों के सुरक्षित सफर पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
सूत्रों की मानें तो कुछ ऐसी ही चिंता यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज की टीम ने शिमला-कालका रेलवे ट्रैक की इंस्पेक्शन के दौरान जताई है। करीब दो माह पहले यूनेस्को की टीम ने रेलवे अधिकारियों के साथ ऐतिहासिक ट्रैक का दौरा करके सुरक्षा को लेकर सर्वे करने के निर्देश दिए हैं।
खतरे के अंदेशे को देखते हुए रेलवे विभाग का सिविल वर्क विंग ट्रैक का सर्वे करने जा रहा है। सहायक अभियंता शिमला दिनेश शर्मा ने कहा कि दो माह पहले यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज की टीम ने ट्रैक का दौरा किया है। सर्वे रूटीन का कार्य है। टनल और ट्रैक को संवारा जाएगा।
टीम का सर्वे और सुझाव
पटरी की भारक क्षमता, सुरंगों की मजबूती और शहरी इलाकों में ट्रैक के इर्द गिर्द हो रहे निर्माण जैसे बिंदुओं को इसमें शामिल किया जाएगा। ट्रैक के इर्द-गिर्द अतिक्रमण को चिह्नित करके रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
पता लगाया जाएगा कि ट्रैक कहीं कमजोर तो नहीं पड़ रहा है। वहीं, टीम ने टनल के भीतर प्रकाश की बेहतर व्यवस्था, आकर्षक पेंट और रिपेयर करने का सुझाव दिया है। टनल के भीतर बदबू न फैले इसके भी प्रयास होंगे। वहीं, ट्रैक के इर्द-गिर्द मुख्य किनारों और माइल स्टोन को भी दुरुस्त किया जाएगा।
2013 में 14 बार यातायात प्रभावित
वर्ष 2013 में रेलवे ट्रैक करीब 14 बार भू स्खलन से प्रभावित रहा है। परवाणू के टकसाल के अलावा शोघी, सोलन, बड़ोग, कनोह के समीप बार-बार ट्रैक बाधित हुआ है। सैलानियों को सड़क तक पैदल पहुंचकर टैक्सियों और बसों में गंतव्य तक पहुंचना पड़ा।
97 किमी लंबे ट्रैक में 103 टनल
करीब 109 साल पहले बने 97 किमी लंबे ट्रैक में 103 टनल हैं। कुल दस ट्रेन इस ट्रैक पर दौड़ती हैं। सुबह से दोपहर कालका से शिमला तक रेलगाड़ियां दौड़ती हैं। वहीं, दोपहर बाद शिमला से कालका के लिए। ट्रेन के अलावा रेलकार भी चलती है, जिसे सैलानी अपने लिए विशेष तौर पर बुक करवाकर इस ट्रैक में रोमांच हासिल करते हैं।