संवाद न्यूज एजेंसी
रादौर। कृषि विज्ञान केंद्र दामला की ओर से बुधवार को जिलास्तरीय यथास्थान फसल अवशेष प्रबंधन विषय पर किसान जागरूकता प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ संयोजक डॉ. एनके गोयल ने किसानों को फसल अवशेष जलाने के बदले तकनीकी विकल्प चुनने के बारे में बताया।
उन्होंने बताया कि आर्थिक रूप से उपयोगी फसल के भाग को ही हम महत्व देते हैं। फसल के बचे हुए भाग को हम आर्थिक रूप से सही न समझ कर उसे नष्ट कर देते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। वहीं फसल के अवशेष आपके आने वाली फसलों के लिए उर्वरा शक्ति का कार्य करते हैं और फसल की उपज तथा उसकी गुणवत्ता को बढ़ाते हैं, इसलिए फसल के अवशेषों को भी आर्थिक रूप से उपयोगी हिस्से की तरह ही प्रबंधन करना चाहिए।
डॉ. गोयल ने बताया कि फसल अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। गेहूं, गन्ना व धान के अवशेष जलाने से वातावरण में 70 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड, 7 प्रतिशत कार्बन मोनोऑक्साईड, 0.66 प्रतिशत मिथेन और 2.09 प्रतिशत नाइट्रस ऑक्साईड निकलती है। इससे मनुष्य और पशुओं में सांस व त्वचा रोगों को बढ़ावा मिलता है और मृदा की ऊपरी सतह से पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि 1 टन पराली जमीन में मिलाने से लगभग 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 7 किलोग्राम सल्फर, 60-100 किलोग्राम पोटाश तथा 1600 किलोग्राम ऑर्गेनिक कार्बन प्रति एकड़ तक जमीन को प्राप्त हो जाते हैं जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ किसान को आर्थिक लाभ पहुंचाने का भी कार्य करती है।
कृषि विभाग के उपनिदेशक डॉ. जसविंदर सिंह सैनी ने बताया कि मेरी फसल-मेरा ब्योरा पर फसल पंजीकरण अवश्य करवाएं। मेरा पानी- मेरी विरासत स्कीम के तहत पानी और मिट्टी संरक्षण का कार्य करें, धान के बदले अन्य फसल लगाने पर कृषि विभाग अनुदान स्वरूप राशि भी उपलब्ध कराता है।
उन्होंने फसल अवशेष प्रबंधन के लिए मशीनों पर उपलब्ध कराई जा रही अनुदान राशि के बारे में भी किसानों को अवगत करवाया। डॉ. वीरसेन अर्थशास्त्र विशेषज्ञ ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन से होने वाले आर्थिक फायदे के बारे में बताते हुए कृषि पर होने वाले व्यर्थ खर्चे से बचने के तरीके भी बताएं।