संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। विश्व हिंदी दिवस को लेकर आयोजित हिंदी पखवाड़ा के तहत तेजली स्थित जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) तेजली में ऑनलाइन संगोष्ठी करवाई गई। संगोष्ठी में साहित्यकारों ने हिंदी भाषा, साहित्य और तकनीक के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे। साथ ही कहा कि हर दिन हिंदी दिवस मनाने ने राष्ट्रभाषा का प्रचार-प्रसार संभव होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डायट प्राचार्या आदर्श सांगवान ने की। संयोजक हिंदी विशेषज्ञ तरसेम चंद रहे। संचालन राजकीय उच्च विद्यालय करेड़ा के हिंदी प्राध्यापक अरुण कुमार कैहरबा ने किया। डायट में वरिष्ठ प्राध्यापक सुरेंद्र पाल अरोड़ा ने हिंदी के प्राचीन इतिहास के बारे बताया। एससीईआरटी गुरुग्राम की विशेषज्ञ सुमिता रांगी ने हिंदी को बढ़ावा देने के लिए ऐसे कार्यक्रम करवाते रहने की मांग की। बीआरपी सुरेश कुमार, रजनी देवी, प्रमोद कुमार, संजीव कुमार ने हिंदी पखवाड़ा की खंड स्तर की रिपोर्ट प्रस्तुत की। रितु, मुस्कान, अनुष्का, मंदीप, अंजलि व शिवम ने भाषण और कविता से प्रस्तुत की। इस दौरान डायट के वरिष्ठ प्राध्यापक अशोक कुमार राणा, अमरजीत सिंह, दुष्यंत चहल, तेजपाल वालिया सहित अन्य उपस्थित रहे।
विद्यार्थियों से संवाद करें अध्यापक
वरिष्ठ प्राध्यापक सुरेंद्र अरोड़ा ने कहा कि हिंदी पखवाड़े पर स्कूलों आयोजित हुई प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों को लेखन और भाषण के अवसर मिले हैं। विद्यार्थियों को ऐसे अवसर निरंतर प्रदान करने होंगे। हिंदी ही नहीं सभी अध्यापकों की जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों से अधिक से अधिक संवाद करें। विद्यार्थियों को संवेदनशील और विचारशील नागरिक बनाकर ही हम बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
हिंदी के लिए दो नंबर आखिर क्यों
डायट तेजली में हिंदी प्राध्यापक तरसेम चंद नेकहा कि 14 सितंबर 1949 को संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का निर्णय किया गया था। इस पर प्रति वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। किसी उपभोक्ता सहायता केंद्र में कॉल करते समय भाषा चयन की श्रेणी में हिंदी को दूसरे स्थान पर रखा जाता है। कहा जाता है कि हिंदी के लिए दो दबाएं, जबकि हमारे देश में हमारी राष्ट्र भाषा को पहला स्थान देना चाहिए।
किताबें पढ़ने का समय सिकुड़ रहा
लघु कथाकार विनय मोहन खारवन ने कहा कि लघु कथा थोड़े में ज्यादा कहने की विधा है। शादी का एलबम एक उपन्यास की तरह होता है, जिसके विभिन्न अध्याय हैं। लघु कथा छोटे-छोटे क्षणों की संवेदना को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। लघु कथा का अंत प्रभावी होना चाहिए। ततैये के डंक की तरह लघु कथा का असर होता है। उन्होंने कहा कि आज किताब पढ़ने का समय लगातार सिकुड़ता जा रहा है। किताबों का कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने विद्यार्थियों को किताबों से दोस्ती करने का संदेश दिया।
तकनीक ने हिंदी को लगाए पंख
कहानीकार ब्रह्मदत्त शर्मा ने कहा कि तकनीकी ने हिंदी को आगे बढ़ाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। आज हम पलक झपकते ही अपना संदेश हिंदी में टाइप कर सकते हैं। यूनिकोड ने कंप्यूटर पर लिखना और छापना आसान किया। हर रोज हिंदी वेबसाइट, ब्लॉग, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर बड़ी संख्या में रचनाएं डाली जाती हैं। उन पर चर्चा होती है। तकनीकी ने किताबों का प्रकाशन आसान बनाया है। इंटरनेट से किताबों और लिखित सामग्री का प्रसार भी हुआ है।
अंग्रेजी की लालसा ने बिगाड़े हालात
साहित्यकार बलदेव राज भारतीय ने कहा कि अंग्रेजी के प्रति मोह के कारण हिंदी और अन्य मातृभाषाओं की घोर उपेक्षा हो रही है। माता-पिता अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए दीवाने होते जा रहे हैं। बैंकों, कार्यालयों और न्यायालयों में अंग्रेजी का ही बोलबाला है। उन्होंने कहा कि आजादी के संघर्षों में हिंदी साहित्यकारों ने न केवल कलम का सिपाही बनकर गुलामी की बेड़ियां काटने का प्रयास किया बल्कि स्वयं जेलों में सजाएं काटी। प्रेमचंद के सोजे वतन सहित अनेक साहित्यकारों की किताबों को अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था।
हिंदी बहुत ही सामर्थ्यवान भाषा
साहित्यकार उमेश प्रताप वत्स ने कहा कि हिंदी का इतिहास पुराना है। हिंदी नदी की तरह से सतत प्रवाह मान है। उन्होंने कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र और प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने हिंदी को गौरवान्वित किया है। हिंदी बहुत ही सामर्थ्यवान भाषा है। लोगों को इसका प्रयोग करने में संकोच और झिझक नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक दिन के दिवस से हम हिंदी का प्रसार-प्रचार नहीं कर पाएंगे। हमें हिंदी के प्रयोग की आदत डालनी होगी। हमें हिंदी में अपनी भावनाएं और विचार प्रकट करने में सक्षम होते हुए हर दिन हिंदी दिवस माना चाहिए।
सारे भारत की शान है हिंदी
प्रसिद्ध गजलकार संजीव अंजुम ने हिंदी की विशेषताओं को रेखांकित करने वाली गजल सुना कर सबका मन मोह लिया। उन्होंने गजल के माध्यम से कहा कि कितनी मीठी जबान है हिंदी। सारे भारत की शान है हिंदी। जैसी लिखने में वैसी पढ़ने में कितनी सादा जबान है हिंदी। उन्होंने कहा कि आज के दौर में सबसे ज्यादा भाषा प्रदूषित हुई है। शब्दों के मर्म को पहचानने वाले कम लोग रह गए हैं। भाषा में खिचड़ी पकाने की रिवायत बढ़ती जा रही है। ऐसे में गजल और कविता की गहराई तक पहुंचना मुश्किल होता गया है।
हिंदी पत्रकारिता में असीम अवसर
साहित्यकार अरुण कुमार कैहरबा ने कहा कि आज हिंदी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टीवी चैनल, वेबसाइट और अन्य मंचों पर हिंदी का खूब प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में रोजगार के अवसर भी बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। पत्रकारिता में कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे लेखन, वाचन, संपादन सहित अनेक कार्य हैं। विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार अपनी प्रतिभा को निखारने के अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि पढ़े-लिखे वर्ग ही हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा मानते हैं। आम लोग तो हिंदी को जीते हैं।