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45 साल से रोशनलाल लावारिस लोगों की अस्थियों को हरिद्वार पहुंचाकर कर रहे विसर्जन

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निरंजन कुमार राणा
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यमुनानगर। कोरोना काल में जहां लोग अपनों का दूर से संस्कार करते हैं, वहीं अस्थियां भी हरिद्वार नहीं पहुंच पा रही। ऐसे में जगाधरी के रहने वाले रोशन लाल गौतम लावारिस शवों की अस्थियों को पूरे विधि विधान से हरिद्वार में तर्पण करने का काम कर रहे हैं। वे पिछले 45 साल से लगातार अकेले इस सेवा का जिम्मा उठाए हुए हैं। पहले वह एक शव की अस्थियां लेकर भी हरिद्वार पहुंच जाते थे, लेकिन कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से 15 दिन में चार-पांच अस्थियों को लेकर जा रहे हैं। 65 साल के रोशन लाल अब तक 400 सौ से ज्यादा शवों की अस्थियां लेकर हरिद्वार में विसर्जित कर चुके हैं।
उन्होंने बताया कि विभिन्न थाना क्षेत्र में मिले लावारिस शवों का हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार दाह संस्कार किया जाता है, जिनकी अस्थियों को बिना विधि विधान के नहरों में विसर्जित कर दिया जाता था। करीब 45 साल पहले वह इलाहाबाद के कुंभ में गया था। वहां एक महर्षि ने अस्थियां विसर्जित करने पर मिलने वाले पुण्य का लाभ बताया था। शास्त्रों में बताया गया है कि इंसान के जीवन में सोलह संस्कार होते हैं। इसमें अंतिम संस्कार अहम माना गया है। उसके बाद वह वापस जगाधरी आ गया और लावारिस शवों की अस्थियों को हरिद्वार ले जाने लगा। उन्होंने बताया कि पंडित परिवार से होने के कारण किसी ने भी उसके इस कार्य का विरोध नहीं किया और माता पिता और भाइयों ने उत्साह बढ़ाया। पिछले साल लंबा लॉकडाउन होने और उत्तराखंड में प्रवेश नहीं मिलने के कारण वह एक साल 10 शवों की अस्थियां लेकर गया था। वे सभी लावारिस अस्थियों का हिंदू रीति-रिवाज अनुसार तर्पण करवाते हैं और अपनी जेब से पंडित वगैरह का खर्च करते हैं। जगाधरी के श्मशान घाट में जब भी किसी लावारिस लाश का दाह संस्कार होता है तो वह वहां पहुंचते है और संस्कार के बाद अस्थियां ले लेते हैं।
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नेक का कार्य का फल भी मिला
-रोशनलाल ने बताया कि साल 2009 में वह बीमार हो गया था और पीजीआई में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था, लेकिन कुछ समय बात उसकी धड़कन चलने लगी और वह ठीक हो गया। साल 2010 में उसने किसी काम से ज्योतिषी को अपनी जन्मकुंडली दिखाई, जिसमें पंडित ने उसे बताया कि जिस आदमी की यह कुंडली है, उसकी तो एक साल पहले मौत हो चुकी है। इसे वह भगवान का चमत्कार ही मानते हैं और कहते हैं कि इतने सालों से नि:स्वार्थ भाव से जो वह काम कर रहे हैं, भगवान ने उसको दूसरी जिंदगी दी है।
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खर्च बढ़ा, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी
-रोशन लाल ने बताया कि शुरू में वह कभी ट्रेन तो कभी बस में हरिद्वार जाता था, उसके बाद स्कूटर पर जाने लगा। उस वक्त उसके केवल दो सौ या तीन सौ रुपये खर्च होते थे। अब यह खर्च भी बढ़कर तीन से पांच हजार रुपये हो गया है। वह महीने में दो से तीन बार तक इस काम के लिए हरिद्वार जाते हैं। उन्होंने बताया कि खर्च देने वाले और कार में बैठाकर हरिद्वार ले जाने वाले काफी यार दोस्त और दानी सज्जन सामने आते हैं, लेकिन वह इस कार्य के लिए किसी से कोई सहायता नहीं लेते। हालांकि कोरोनाकाल में वह बस और ट्रेन होने की स्थिति में अपने भतीजे की गाड़ी में जरूर हरिद्वार चले जाते हैं। उन्होंने बताया कि इतने सालों में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आई, बस कोरोनाकाल में आने जाने की दिक्कत हुई हैं।
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