नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट में अच्छी रैंक हासिल करने के बावजूद हरियाणा के कई अव्वल विद्यार्थियों ने प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के लिए दाखिला नहीं लिया। सरकार की नई बॉन्ड पॉलिसी से बचने के लिए विद्यार्थियों ने दूसरे प्रदेशों के मेडिकल कॉलेजों की ओर रुख किया है।
विद्यार्थियों का कहना है कि वे प्रति साल दस लाख रुपये का लोन लेकर 40 लाख के कर्जदार नहीं बनना चाहते, इसलिए मजबूरी में वे यूपी, हिमाचल समेत अन्य प्रदेशों के मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के लिए पहुंचे हैं। एक तो बाहर के कॉलेजों में ऐसी बॉन्ड पॉलिसी नहीं है और दूसरा सालाना फीस भी कम है। काफी विद्यार्थियों के बाहर जाने से प्रदेश में कम अंकों वाले विद्यार्थियों को भी स्टेट कोटे के तहत एमबीबीएस में दाखिला मिल गया है।
631 अंक, फिर भी हिमाचल आ गया
फरुखनगर गुरुग्राम निवासी वंश ने परीक्षा में 631 अंक हासिल किए। उसने हिमाचल प्रदेश के एसएलबीएस में दाखिला लिया। यहां पर साल की फीस 50 हजार रुपये है। वंश का कहना है अगर हरियाणा सरकार की बॉन्ड पालिसी इतनी सख्त न होती तो वे अपने ही प्रदेश में ही पढ़ाई करते। अंकों के हिसाब से उसे प्रदेश के किसी भी कॉलेज में एडमिशन मिल सकता था। अपना प्रदेश अपना ही होता है, लेकिन परिवार इतना लोन नहीं लेना चाहता, फिर एमबीबीएस के बाद नौकरी की भी कोई गारंटी नहीं है। उसने बताया कि अच्छी रैंक के बावजूद गुरुग्राम के ही प्रभात सिंह ने लखनऊ मेडिकल कॉलेज और गोरांग ने दतिया कॉलेज में दाखिला लिया है।
चाहा था रोहतक, लेकिन सेंट्रल कॉलेज पहुंच गया
नारनौल निवासी तरुण कुमार ने नीट में 626 अंक हासिल किए। उनकी तमन्ना थी कि रोहतक सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करे। अंक भी इतने थे कि उसे यहां पर दाखिल मिल जाता, लेकिन इसके लिए उसे बॉन्ड भरना पड़ता। इससे बचने के लिए ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज फरीदाबाद का चुनाव किया। क्योंकि यह कॉलेज केंद्र के अंतर्गत है और यहां पर हरियाणा सरकार का बांड वाला नियम लागू नहीं होता है। सरकार को पॉलिसी में संशोधन करना चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर अव्वल विद्यार्थी भी डाक्टर बन सकें।
मजबूरी में बदायूं पहुंचा किसान का बेटा
हिसार निवासी किसान के बेटे प्रवेश ने डॉक्टर बनने के लिए जी तोड़ पढ़ाई की, नीट में रैंक भी अच्छी आई और 618 अंक प्राप्त किए। लेकिन चाहकर भी वह हरियाणा के सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं ले पाया। उससे कम अंक वालों ने यहां पर दाखिला लिया है। अब मजबूरी में उसने बदायूं यूपी मेडिकल कालेज में एडमिशन लिया। यूपी में दो साल का बांड है, अगर सरकार जॉब न दे पाई तो बॉन्ड खत्म माना जाएगा और दूसरा ट्यूशन फीस प्रति साल मात्र 36 हजार रुपये है। उसका कहना है कि प्रति साल दस लाख रुपये के बॉन्ड भरने की स्थिति में हम नहीं हैं, क्योंकि परिवार के लोग पहले से ही हमारी तैयारी पर काफी पैसा खर्च कर चुके हैं।
कम रैंक वालों को भी मिल गया दाखिला
विद्यार्थियों द्वारा दूसरे प्रदेशों के कालेजों में जाने का असर ये हुआ कि उनकी खाली हुई सीट पर उनसे कम अंक वाले विद्यार्थियों का दाखिला हो गया। पिछले साल रोहतक मेडिकल यूनिवर्सिटी में पिछले साल कट ऑफ लिस्ट 619 थी, लेकिन इस बार यह आंकड़ा घटकर 615 अंक तक पहुंच गया है। पिछले साल ऑल इंडिया रैंक के हिसाब से छह हजार रैंक तक के विद्यार्थियों के दाखिल हुए थे, लेकिन बार यह रैंक 13 से भी नीचे तक खिसक गई है। इसके उल्ट पिछले साल ईएसआईसी फरीदाबाद में 592 के अंक वाले का दाखिला हुआ था, जबकि इस बार यहां पर 627 तक पहुंच गया। यहां पर प्रदेश सरकार की शर्तें लागू नहीं होती हैं।
कोई ज्यादा असर नहीं : डॉ. लोहचब
एडमिशन कमेटी के चेयरमैन और पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विवि के डीन एकेडमिक अफेयर डॉ. एसएस लोहचब का कहना है कि उन्होंने पूरे आंकड़े देख लिए हैं। पिछले साल के मुकाबले कोई ज्यादा अंतर नहीं है। मामूली अंतर है। जाहिर सी बात है कि अगर कोई सीट छोड़ता है तो उसके स्थान पर उससे पिछले विद्यार्थी का एडमिशन होगा। टापर्स के हरियाणा में दाखिला न लेकर दूसरे प्रदेशों में जाने को लेकर ऐसी कोई जानकारी मेरे संज्ञान में नहीं है।