अपने क्राफ्ट और कल्चर के लिए मशहूर अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले को लगते 27 वर्ष पूरे हो गए। 28वें मेले की तैयारियां चल रही हैं, लेकिन अब तक उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे सांस्कृतिक विविधता के धनी राज्यों ने यहां ‘थीम स्टेट’ बनने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इन दोनों प्रदेशों की ‘ना’ के चक्कर में कई राज्य दो से तीन बार थीम रह चुके हैं। अब गोवा को भी दूसरी बार बनाया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक यह मेला ‘थीम स्टेट’ बनने वाले राज्य को एक नई पहचान दिलाता है। उसका पर्यटन कारोबार बढ़ाता है। इसमें आने वाला प्रदेश आठ-दस लाख देसी-विदेशी सैलानियों से खुद को रूबरू करवाता है।
सूरजकुंड मेले के ऑफिसर इंचार्ज राजेश जून के मुताबिक इन दोनों राज्यों को न्योता भेजा गया था, लेकिन उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई, इसलिए दूसरे राज्य को मौका दिया गया। जबकि थीम स्टेट को लेकर कई राज्यों के बीच काफी रस्साकशी भी होती है।
आंध्र प्रदेश तीन बार, एमपी, राजस्थान और पश्चिम बंगाल दो-दो बार इसका थीम बन चुके हैं, क्योंकि मेले में आने से इन राज्यों को टूरिज्म कारोबार में फायदा हुआ है। जून के मुताबिक थीम स्टेट से मेजबान कोई रकम नहीं लेता। बस मेले को सजाने और लोक कलाकारों पर पैसा खर्च करना पड़ता है। जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में से कोई भी इसका थीम बनता तो यहां ज्यादा भीड़ आती। क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में इन्हीं दोनों प्रदेशों के सबसे ज्यादा लोग रहते हैं।
थीम स्टेट की लोकप्रियता से आया कंट्री पार्टनर का कांसेप्ट
थीम स्टेट की लोकप्रियता के कारण ही 2007 में कंट्री पार्टनर बनाने की घोषणा की गई। इसकी शुरुआत पहली बार 2009 में हुई। प्राचीनतम सभ्यता, संस्कृतियों वाले देश इजिप्ट (मिश्र) को इसका मौका मिला। वर्ष 2010 में तजाकिस्तान कंट्री पार्टनर बना। इसी प्रकार 2011 में उज्बेकिस्तान ने यह गौरव हासिल किया। 2012 में थाईलैंड और 2013 में अफ्रीकन देश कंट्री पार्टनर बने। वर्ष 2014 के लिए श्रीलंका पार्टनर बन रहा है। मेले के बहाने कूटनीतिक संबंधों को मजबूती भी मिल रही है।
ये होता है फायदा:
जो थीम स्टेट और देश कंट्री पार्टनर बनता है वह मेले में अपने क्राफ्ट, खानपान, पहनावे व नृत्य-संगीत का प्रचार करता है। मेले में जो भी सामान बिकता है उस पर टैक्स नहीं लगता, जिसका फायदा उस राज्य के शिल्पियों को होता है।