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लॉकडाउन लगते ही बढ़ा मजदूरों का पलायन, बच्चों के साथ सिर पर बैग रखकर जाने वालों की लगी कतार

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कोरोना का प्रकोप बढ़ने पर सरकार ने लॉकडाउन लगाना शुरू कर दिया है और यहां अभी दो दिन के लिए लॉकडाउन लगाया गया है, जिससे लॉकडाउन में पिछले साल के हालात को देखते हुए प्रवासी मजदूरों के अंदर डर पैदा हो गया है। जिस तरह से पिछले साल सैकड़ों किमी भूखे-प्यासे पैदल चलकर प्रवासी मजदूर अपने घर पहुंचे, वहीं इस बार लॉकडाउन लगते ही मजदूरों ने परिवार संग पलायन शुरू कर दिया है।
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यह पलायन कुछ दिन पहले ही शुरू हो गया था, लेकिन यहां लॉकडाउन लगने पर बच्चों के साथ सिर पर बैग रखकर जाने वालों की कतार लग गई है। जीटी रोड पर ऐसे प्रवासी मजदूरों की लाइन लगी हुई है और वह बीसवा मिल के पास प्राइवेट बसों से अपने घर जाने के लिए पहुंच रहे हैं। वहीं मजदूरों के पलायन से पहले ही फैक्टरी कम चल रही थी तो अब कई उद्यमियों ने फैक्टरी को फिलहाल बंद कर दिया है और वह हालात ठीक होने पर दोबारा चलाने की बात कह रहे हैं।
कोरोना के कारण जब पिछले साल लॉकडाउन की घोषणा हुई तो यातायात अचानक बंद होने से सबसे ज्यादा परेशानी प्रवासी मजदूरों को झेलनी पड़ी थी। मजदूरों के लिए जब खाने की परेशानी हुई तो वे पैदल ही घर के लिए निकल गए थे और सैकड़ों किमी पैदल चलकर किसी तरह अपने घर पहुंचे थे। इसके साथ ही उनको रास्ते में लाठियां तक खानी पड़ी थीं। जिसके बाद फैक्टरी शुरू हुई तो मजदूर काफी मशक्कत के बाद लौटे थे। उस तरह के हालात करीब 15 दिन पहले दोबारा पैदा होने लगे थे, लेकिन अब प्रदेश में पहली बार लॉकडाउन हुआ तो यहां से पलायन करने वाले मजदूरों की लाइन लग गई है। हालात यह है कि मजदूर अपने व बच्चों के सिर पर बैग रखकर बीसवा मिल के पास पहुंच रहे हैं, क्योंकि वहां से केजीपी से प्राइवेट बस यूपी व बिहार जाती हैं। उन बसों में ऐसे प्रवासी मजदूर वापस अपने घर जा रहे हैं। इसलिए ही कुंडली, राई, नाथूपुर, बहालगढ़ औद्योगिक क्षेत्र से करीब 20 हजार से ज्यादा मजदूर अभी तक पलायन कर चुके हैं और मजदूरों की शनिवार सुबह को अपने घर जाने के लिए जीटी रोड पर लाइन लगी हुई थी।
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बसों में बैठाए जाते हैं 100 मजदूर, कोरोना नियमों की उड़ाई जाती हैं धज्जियां
जिन निजी बसों में यूपी व बिहार के मजदूर अपने घर जा रहे हैं, उनमें करीब 100 मजदूर बैठाए जाते हैं। उनमें भी किसी की कोरोना जांच नहीं कराई जाती है। उन सभी मजदूरों से 2-2 हजार रुपये तक वसूली की जाती है। ऐसे में प्रवासी मजदूरों को घर जरूर लेकर जाते हैं, लेकिन उससे कोरोना फैलने का खतरा भी बढ़ रहा है। यह मामला अधिकारियों के संज्ञान में पहले ही आया था। उसके बावजूद अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया, जिससे कोरोना नियमों का पालन कराया जा सके। वहीं बस चालक साफ कहते है कि कोरोना की जांच कराना उनकी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि मजदूर को खुद ही जांच करानी होगी। अगर कोई जांच कराकर नहीं आता है तो उसके बाद भी वह उसे लेकर जाने से इनकार नहीं करते हैं।
किसी ने फैक्टरी को बंद किया तो कोई कम चला रहा
जहां पहले प्रवासी मजदूर खुद पलायन कर रहे थे और उनके पलायन से फैक्टरियों को चलाने में परेशानी आ रही थी। वहीं अब उद्यमियों ने खुद ही फैक्टरी बंद करनी शुरू कर दी है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कई प्रदेशों में लॉकडाउन है तो दिल्ली के अंदर भी लॉकडाउन चल रहे है। जिससे केवल जरूरी चीजों को छोड़कर अन्य सामान के वाहन नहीं जा सकते हैं। इससे सामान की सप्लाई पूरी तरह से ठप हो गई है। ऐसे में उन फैक्टरी को फिलहाल बंद कर दिया गया है और मजदूरों को काम मिलना भी बंद हो गया है। जबकि कई फैक्टरी में उत्पादन कम कर दिया गया है और वह कम समय फैक्टरी चल रहे हैं। कुंडली इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन के प्रधान सुभाष गुप्ता ने बताया कि करीब 20 हजार मजदूर अभी तक जा चुके हैं। कोरोना के कारण हालात काफी खराब हैं और लॉकडाउन के कारण माल की सप्लाई भी रुक गई है। ऐसे में फैक्टरी बंद करनी पड़ रही है तो कोई कम चल रही है। इससे मजदूरों को बैठाकर पैसे नहीं दिए जा सकते हैं।
यह बोले मजदूर
यहां काम नहीं मिल रहा है और मकान मालिक किराया नहीं छोड़ेगा। लॉकडाउन जब पहले लगा था तो किसी तरह घर तक पहुंचे थे। खाना तक नहीं मिला था तो लाठियां तक खानी पड़ी थीं। इसलिए पहले ही घर जा रहे हैं, जिससे वहां अपने परिवार के साथ रहकर कोई काम करेंगे।
- राजीव, बिहार
कोरोना के कारण परेशानी हो रही है और कंपनी चल नहीं रही है। इसलिए काम नहीं मिल रहा है तो अपने घर जा रहे हैं। बस में 1500 रुपये खर्च करके जाएंगे। वहां खाने की परेशानी नहीं रहेगी और परिवार के साथ रहेंगे। पहले काफी परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। - मुकेश कुमार, बिहार
मैं नाथूपुर में काम करता था, लेकिन अब कंपनी बंद हो गई है। कंपनी वालों ने कह दिया है कि अभी काम नहीं मिलेगा। ऐसे में अपनी जेब से खाना पड़ेगा और मकान का किराया भी देना पड़ेगा। अब रेल से नहीं जा सकते हैं तो बस से वापस जा रहे हैं। निजी बस आती है और उसमें ही सभी मजदूर चले जाते हैं।
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- राजेंद्र, यूपी
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