फोटो : 04: सोनीपत के खरखौदा स्थित नागरिक अस्पताल के अंदर बैठे बंदर। संवाद
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खरखौदा। नगरपालिका की तरफ से शहर में बंदरों को पकड़ने के लिए चलाए जा रहे अभियान की जमीनी हकीकत पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। लोगों का आरोप है कि यह मुहिम कागजों तक सीमित होकर रह गई है जबकि शहर में बंदरों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रशासनिक के दावों से राहत नहीं मिल रही है।
शहरवासी मदन, अजय, राहुल का कहना है कि बंदरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सार्वजनिक स्थानों पर बंदरों का आतंक आम हो चुका है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई मामलों में लोग बंदरों के हमले में घायल भी हो चुके हैं, बावजूद इसके प्रभावी और ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।
महेश व मोनू का आरोप है कि सबसे चिंताजनक स्थिति सरकारी अस्पताल की है, जहां बंदर के काटने के बाद लोग एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने पहुंचते हैं। विडंबना यह है कि अस्पताल स्वयं बंदरों से सुरक्षित नहीं है। अस्पताल परिसर ही नहीं, बल्कि अंदर तक बंदरों की खुलेआम आवाजाही बनी हुई है।
इलाज कराने आए मरीजों और उनके तीमारदारों को बंदरों के हमले का डर सताता रहता है। बंदर पकड़ने के लिए पहले जारी किया गया टेंडर रद्द कर दोबारा टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई थी ताकि समस्या का स्थायी समाधान निकल सके। लेकिन अब नए टेंडर के बाद भी ठेकेदार केवल औपचारिकता निभा रहा है।
बंदर पकड़ने का कार्य नियमानुसार किया जा रहा है। शहर में बंदरों के कारण समस्या गंभीर है और इसे पूरी तरह समाप्त करने में समय लग सकता है। संबंधित एजेंसी को अभियान में तेजी लाने तथा अस्पताल समेत संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं।
- हीरा लाल, नपा अध्यक्ष खरखौदा