बुटाना चौकी के सिपाही रविंद्र व एसपीओ कप्तान ने हत्यारोपियों से काफी देर तक लड़ते हुए संघर्ष किया। वहीं सिपाही रविंद्र ने ड्यूटी का फर्ज भी निभाया और उसके हाथ पर लिखे गाड़ी के नंबर ने पुलिस को हत्यारोपियों तक पहुंचा दिया। सिपाही रविंद्र अपने हाथ पर गाड़ी का नंबर नहीं लिखता तो शायद पुलिस के लिए इस घटना का खुलासा करना आसान नहीं होता और वह हत्यारोपियों तक इतनी जल्दी नहीं पहुंच पाती।
इसलिए एसपी जश्नदीप रंधावा ने खुद भी माना कि गाड़ी के नंबर से पूरी घटना का खुलासा हुआ और हत्यारोपियों तक पहुंच सके। एसपी के अनुसार दोनों पुलिस कर्मियों ने बखूबी ईमानदारी से ड्यूटी निभाई है। वहीं हत्या के बाद सुबह तक उनके शव पड़े होने के बावजूद चौकी व थाने की पुलिस के ध्यान नहीं देने के मामले में किसी तरह की कोई लापरवाही है तो उसकी जांच कराई जाएगी।
एसपी जश्नदीप सिंह ने बताया कि जब सिपाही रविंद्र व एसपीओ कप्तान गश्त करते हुए हरियाली सेंटर के पास पहुंचे तो वहां खड़ी गाड़ी को देखकर सिपाही ने अपने हाथ पर उसका नंबर लिख लिया। वह इसलिए किया गया, जिससे उसमें अपराधी होने पर अगर वह भागते हैं तो उनको गाड़ी के नंबर के आधार पर पकड़ा जा सके। लेकिन वहां आरोपियों ने उनपर हमला कर दिया तो उस समय भी डंडे के सहारे ही सिपाही व एसपीओ ने धारदार हथियार ले रहे आरोपियों से काफी देर तक संघर्ष किया।
एसपी के अनुसार सिपाही के हाथ पर लिखा गाड़ी का नंबर ही घटना के खुलासे की सबसे अहम कड़ी रही। उस गाड़ी के नंबर को ट्रेस किया गया तो वह जींद के गुरमीत के नाम पर निकली। उससे पूछताछ करने पर पता चला कि उसने वह गाड़ी संदीप को बेची थी। जिसके बाद संदीप की तलाश शुरू की गई और उसे सर्विलांस के सहारे पकड़ लिया गया।
उसने पुलिस को पूरी घटना बताई और उसके बाद अमित व विकास को पकड़ने जाने पर पुलिस पर हमले के अलावा अमित की गोली लगने से मौत हुई। एसपी जश्नदीप रंधावा ने खुद माना कि जहां सिपाही रविंद्र ने हत्यारोपियों से लड़ते हुए संघर्ष किया, वहीं उसने हाथ पर गाड़ी का नंबर लिखकर ड्यूटी का फर्ज भी निभाया। उसके हाथ पर गाड़ी का नंबर लिखने के कारण ही पूरे मामले का पटाक्षेप हो सका है।