जो लोग उस समय पागल बताते थे अब वहीं लोग उस समय के हौसले की तारीफ करते हैं। अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि पर भव्य-दिव्य मंदिर का निर्माण मेरे जीवन का सपना था, जो अब सच हो रहा है। अपनी खुशी और भावना को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। 6 दिसंबर 1992 का वह पल अब मुझे याद है जब ट्रेन अयोध्या स्टेशन पर न रुकते हुए आगे निकल गई थी और कुछ देर जाते ही एक सीटी बजी थी और देखते-देखते ही पूरी ट्रेन खाली हो गई थी।
इस घटना का जिक्र करते हुए सिरसा के बाजेकां निवासी कार सेवक त्रिभुवन सिंह भाव विह्वल हो जाते हैं। कहते हैं, उसे सीटी नहीं, प्रभु प्रभु श्रीराम के काज करने का संदेश समझ लीजिए। ट्रेन रुकते ही सभी लोग कूद गए और छिपते-छिपाते अयोध्या पहुंचकर कार सेवा में जुट गए। कहते हैं- घटना के बाद मुझे गिरफ्तार कर इंटरमीडिएट कॉलेज बहराइच और सेंट्रल जेल बरेली में 21 दिनों तक रखा। 27वें दिन अपने गांव पहुंचा था।
22 जनवरी को श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में अयोध्या न जा पाने की टीस सीने में छिपाए त्रिभुवन सिंह कहते हैं- मेरा सपना सच हो रहा है। इससे बड़ी खुशी और कुछ भी नहीं हो सकती। मुझे याद है- तब दसवीं कक्षा में पढ़ता था। लोग श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में शामिल होने के लिए जा रहे थे। मैं भी ट्रेन में चढ़ गया। ट्रेन में सिरसा के 60 से 70 लोग थे।
सर्दी का मौसम था, समझ नहीं होने के कारण कपड़े ज्यादा नहीं लिए थे। रोहतक और दिल्ली स्टेशनों पर पुलिस लोगों को गिरफ्तार कर रही थी। पुलिस से बचकर रात दिल्ली रेलवे स्टेशन पर गुजारनी पड़ी थी। सर्दी ज्यादा होने पर प्रो. गणेशी लाल ने अपने साथ सुलाया था। ट्रेन में सवार होकर अयोध्या पहुंचे थे पर स्टेशन पर ट्रेन को रुकने नहीं दिया गया। कार सेवक चेन पुलिंग कर उतरे थे।
40 मिनट में बदल गया था पूरा मंजर
राम मंदिर आंदोलन के साक्षी सिरसा निवासी डॉ सुरेश वत्स को वह मंजर आज भी याद है। कहते हैं-बड़ी संख्या में पुलिस तैनात थी और लोहे के बैरिकेड्स लगाए गए थे। लाखाें युवा राममंदिर के पास मौजूद थे। लालकृष्ण अडवानी भाषण दे रहे थे पर युवाओं का उस ओर ध्यान नहीं था। अचानक चंपतराय ने पुलिस से कहा कि यह सीटी पर चलने वाले नहीं हैं, पीटी वाले हैं। वानर सेना को रोकना मुमकिन नहीं है।
इसी वक्त एक साधु ने बस से बैरिकेड्स को उड़ा दिया और सीधे मंदिर स्थल तक पहुंच गया। आगे आगे बस, पीछे युवाओं का हुजूम। मंजर बदल चुका था। हर कोई अपने स्तर पर ढांचे को तोड़ने लगा था। 40 मिनट में ढांचा ध्वस्त हो चुका था। डॉ. सुरेश ने बताया कि उनकी और गोविंद भारद्वाज की कार सेवकों के ठहरने और खाने की व्यवस्था में ड्यूटी लगाई गई थी।