सिरसा। खेती के साथ किसान अब आय के अन्य संसाधनों की खोज में अन्य विकल्प अपना रहे हैं। किसान गुरसेवक सिंह अपनी 20 एकड़ जमीन में आय के विभिन्न साधन के साथ पिछले 9 सालों से मधुमक्खी पालन का कार्य कर रहे हैं। खेतों से आने वाली आय के साथ मधुमक्खी पालन से आने वाली आय उसे मुनाफा दे रही है। जिसे देख अन्य किसान साथी भी मधुमक्खी पालन, झींगा पालन, पोल्ट्री फार्म कार्यों को करने का प्रशिक्षण ले रहे हैं।
कालांवाली के गांव भुकावाली का किसान गुरसेवक सिंह हाथ पर चोट लगने से दसवीं कक्षा के आगे पढ़ नहीं पाए। विदेश जाना चाहते थे लेकिन परिजनों ने शादी करवा दी। 20 एकड़ जमीन में खेती करने के साथ आय के अन्य विकल्प खोजने की जिज्ञासा थी। उन्होंने 2010 में कृषि विज्ञान केंद्र सिरसा से एक सप्ताह की बी-किपिंग की ट्रेनिंग ली और 50 डिब्बों के साथ किसी के साथ साझेदारी में कार्य शुरू किया।
एक साल के अनुभव में आई मुश्किलों को समझने के लिए दोबार प्रशिक्षण लिया और उसके बाद उन्होंने शहद के 43 डिब्बे लगा पहली बार में ढाई लाख रुपये कमाए। जिसके बाद 2012 के अंत में शहद के लिए मधुमक्खियों के 900 डिब्बे लगाए। अब एक सीजन में इन डिब्बों से करीब एक हजार क्विंटल शहद प्राप्त करते हैं। कच्चा शहद 100 से लेकर 150 रुपये किलो के अनुसार बिकता है और प्रोसेस किए शहद का 600 रुपये प्रति किलो भाव के अनुसार लोग खरीद रहे हैं।
किन्नू व मौसमी के बाग से भी कर रहे हैं कमाई
गुरसेवक सिंह को 20 एकड़ भूमि आती है। उन्होंने 12 एकड़ में किन्नू व मौसमी का बाग लगाया व 8 एकड़ ठेके पर दें खुद बी-किपिंग का कार्य कर रहे हैं। पौधों में जब तक फल नहीं लगने शुरू हुए तो उन्होंने पौधों के पास क्यारियां डाल सब्जी लगाने और मंडी में उन्हें बेचकर खर्च निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी। अब 12 एकड़ में लगे किन्नू व मौसमी के इस बाग से वह वर्तमान में खर्चा निकालकर 12 लाख रुपये सालाना बचत कर रहे हैं।
प्रोसेस शहद में दोगुना मुनाफा, दे रहे है निशुल्क प्रशिक्षण
गुरसेवक सिंह बताते है कि डिब्बों से निकलने वाला कच्चा शहद अशुद्ध होता है। जिससे प्रोसेस कर खाने लायक बनाया जाता है। सरसों का सीजन दिसंबर से फरवरी माह तक का होता है। जिससे प्राप्त शहद को प्रोसेस कर पैकिंग में भरा जाता है। जो शहद 150 रुपये का था वो प्रोसेस कर 500 से 600 रुपये प्रति किलो के अनुसार बिकता है। उनके पास करीब 5 तरह की वैरायटी का शहद उपलब्ध हैै जिसमें सरसों, शीशम, अजवाइन, सफेदा व बेरी शामिल है।
शहद के डिब्बों से निकलने वाले पोलन, मुनाफे का सौदा
मधुमक्खी द्वारा शहद के साथ-साथ फूलों से पोलन भी एकत्रित किया जाता है। मधुमक्खी शहद लेकर डिब्बे में जाने लगती है तो डिब्बे के शुरू में लगी जाली में पैरों पर लगा पोलन पकड़ लेता है। पोलन डिब्बे लगाने के शुरूआती 20 दिनों में एकत्रित किया जाता है, क्योंकि उस समय सरसों के फूल खिल रहे होते हैं। पोलन 250 से 500 ग्राम प्रति डिब्बे से प्राप्त होता है। जिसकी बाजार में 250 रुपये प्रति किलो कीमत है। पोलन ऐसा पदार्थ है जिसके सेवन से शरीर को जरूरी तत्व मिलते हैं।
मधुमक्खी पालन में यह रहती है चुनौती
मधुमक्खी पालन में सबसे बड़ी चुनौती है कि डिब्बों को मौसम व फसल के अनुसार दूसरी जगहों पर लेकर जाना पड़ता है। जिससे ट्रांसपोर्ट पर काफी खर्च आता है और समय रहते अगर डिब्बों की जगह नहीं पहुंचे तो मक्खियों के मरने का डर बना रहता है। साथ ही यहां डिब्बे लगाए जाने हो वहां पानी व छाया की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए नहीं तो मक्खी मर सकती हैं। कई बार डिब्बे लगाए जाने पर वन व नहर विभाग के अधिकारी एतराज जताते हैं।
निशुल्क देते है प्रशिक्षण
बी-किपिंग को लेकर गुरसेवक सिंह के पास करीब 10 वर्ष का अनुभव है। ऐसे में उन्हें मधुमक्खी पालन में आने वाली परेशानियों से अच्छे से अवगत है। अब वह अपने इस अनुभव को लोगों तक पहुंचा रहे है। मधुमक्खी पालन को लेकर अगर कोई उनसे प्रशिक्षण लेना चाहे तो वह उसे निशुल्क प्रशिक्षण देते है और इसकी बारीकी से जानकारी देते है।
डिब्बे पर लगी पोलन से भरी झेली को निकालते हुए।- फोटो : Sirsa