ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा मुहैया करवाने के उद्देश्य से खंड स्तर पर खोले गए आरोही मॉडल स्कूल अनदेखी से बेहतर शिक्षा के सुनहरे सपने से कोसों दूर होकर रह गए हैं। बानगी ये है कि इन स्कूलों की मुख्य समस्याओं के बारे में लंबे अरसे सेे अधिकारी अवगत हैं, लेकिन समस्या के हल के आसार अभी तक नजर नहीं आ रहे, जिसके चलते अभिभावक इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि आखिर अपने बच्चों को इन शिक्षण संस्थानों में कैसे भेजें।
दरअसल सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में खंड स्तर पर पिछड़े हुए गांवों में आरोही मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल खोले गए थे, जिसके तहत ओढां खंड के गांव जलालआना में भी खंड स्तर पर उक्त स्कूल खोला गया था। इन इंग्लिश मीडियम मॉडल स्कूलों का मुख्य उद्देश्य से बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति की ओर अग्रसर करना था। स्कूल खुलने के बाद क्षेत्र के विद्यार्थियों को एक उच्च शिक्षा की उम्मीद जगी थी, लेकिन सुविधाओं के अभाव ने उनकी उम्मीद को धुंधला साबित कर दिया है। इन सभी स्कूलों में ट्रांसपोर्ट की तो समस्या है ही, इसके अलावा विद्यार्थी बिजली-पानी की भी किल्लत झेलकर पढ़ाई करने को विवश हैं। विशेष बात तो ये है कि इन स्कूलों को खुले पांच वर्ष का समय हो गया, लेकिन ट्रांसपोर्ट और बिजली आदि की समस्या का हल नहीं हो पाना सरकार की शिक्षा नीति को धूमिल कर रहा है।
कालूआना को छोड़ सभी जगह यही हालात
ट्रांसपोर्ट की समस्या अकेले जलालआना की नहीं है, अपितु जिले में बड़ागुढा खंड में गांव झीड़ी, डबवाली खंड में गांव कालूआना, चोपटा खंड में नाथूसरी कलां, रानियां में। महमदपुरिया और ऐलनाबाद में खारी सुरेरां सहित कुल छह आरोही मॉडल स्कूलों में यही मुख्य समस्याएं हैं और प्रदेशभर में खोले गए अन्य 36 स्कूलों में भी यही हालात हैं। जहां छात्रों को अपने स्तर पर यातायात का प्रबंध करना पड़ रहा है। जिले में गांव कालूआना ऐसा गांव है, जहां ग्राम सरपंच जगदेव सहारण के प्रयासों से बच्चों को चार बसें मिल पाई हैं। बताया जा रहा है कि एकमात्र सीनियर सेकेंडरी स्कूल में मेडिकल और नॉन-मेडिकल की कक्षाएं शुरू हुई थीं, उस वक्त दोनों संकायों में छात्रों की संख्या कम होने से विभाग की तरफ से अनुमति मिलना मुश्किल हो गया था, जिसके लिए ग्राम पंचायत ने सर्वप्रथम कालूआना वेलफेयर शिक्षा समिति का गठन कर अपने स्तर पर एक बस खरीदी थी। इसके बाद दोनों संकायों का अच्छा परिणाम और छात्र संख्या देखकर प्रशासन से यातायात सुविधा की मांग की गई, जिस पर तत्कालीन डीसी युद्धवीर सिंह ख्यालिया ने बीआरजीएफ योजना के तहत सात बसें उपलब्ध करवा दी। इस समय उक्त बसों का खर्च कालूआना वेलफेयर शिक्षा समिति अपने स्तर पर ही वहन कर रही है।
बिजली-पानी की भी समस्या
जलालआना स्कूल में दाखिला लेने के बाद आसपास के गांवों के साधन संपन्न छात्र तो यहां आते रहे, लेकिन मध्यम वर्गीय कई छात्र यातायात की समस्या से स्कूल छोड़ गए। इसके अलावा मुख्य समस्या बिजली की भी है, जो पूरा दिन में दो घंटे आती है। जेनरेटर की सुविधा न होने के कारण स्कूल के करीब 280 बच्चे पसीने से तरबतर होकर शिक्षा ग्रहण करते हैं तो वहीं प्रिंसिपल कार्यालय में एक कंप्यूटर तक की व्यवस्था विभाग की तरफ से नहीं की गई। ऐसे में स्टाफ ने किसी अन्य स्कूल से कंप्यूटर मांगकर काम चला रखा है। उधर, रानियां के महमदपुरिया स्कूल में भी यही समस्या है, जहां ट्रांसपोर्ट सुविधा तो दूर शिक्षार्थी 300 छात्रों को ठंडा पानी तक नहीं मिल रहा। बताया जा रहा है कि बसों की सुविधा को लेकर लोग कई बार अधिकारियों से मिल चुके हैं, लेकिन अभी तक महज आश्वासन ही मिल रहे हैं।
मेरे ध्यान में उक्त समस्या पहली बार आई है, मैं स्कूल में दौरा कर समस्याएं जानूंगा और उन समस्याओं को शिक्षामंत्री के समक्ष रखकर उन्हें हल करवाने की पूरी कोशिश करूंगा।
देव कुमार शर्मा, भाजपा नेता डबवाली
ट्रांसपोर्ट की समस्या तो है, लेकिन इसके लिए बजट नहीं है, समस्या का हल बजट आने पर ही होगा। हम उच्चाधिकारियों को समस्या बारे कई बार अवगत करवा चुके हैं।
मधु मित्तल, डीईओ सिरसा