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डीएसपी बोले, यहां लेने क्या आते हो, आपका भगवान तो वहां भी है

Tue, 19 Jul 2016 01:15 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सिरसा
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अमरनाथ यात्रा - फोटो : bureau
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आतंकवादी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में पनपी हिंसा के बीच अमरनाथ यात्री ही एक-दूसरे का सहारा बने हुए हैं। आतंक से जहन्नुम बनी घाटी में पुलिस कुछ नहीं करती। इतना हीं डीएसपी स्तर के अधिकारी के सामने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते हैं। मदद मांगने पर उनसे कुछ और ही जवाब मिलता है। अपवाद स्वरूप कुछ कश्मीरियों को छोड़कर केवल फौज पर ही विश्वास किया जा सकता है। सुलग रही घाटी में फौजी भी सुरक्षित नहीं। कोई पत्थर मारें तो उसे पीटने के लिए उसे उच्च अधिकारियों की परमिशन लेनी पड़ती है। अलगाववादी पर गोली चलाना तो बहुत दूर की बात है। यह आपबीती साझा की अमरनाथ यात्रा से लौटे डबवाली के निवासी दिनेश कुमार और अजय कुमार ने।
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छह जुलाई को दोपहर 12 बजे हम डबवाली से अमरनाथ के लिए रवाना हुए थे। सात जुलाई को हम कश्मीर पहुंचे तो बस का टायर पंक्चर हो गया। पास ही एक ढाबा था हम चाय पीने लगे। ढाबा मालिक से पूछा ईद कल थी, आप आज मना रहे हो। ढाबा मालिक ने जो जवाब दिया उसकी हमें उम्मीद नहीं थी। उसने कहा कि कल ईद हिंदुस्तान में थी, आज ईद कश्मीर में है।
बीएसएफ के तंबू में रात गुजारने के बाद आठ जुलाई को चढ़ाई शुरू कर दी। शेषनाग तथा गणेश टॉप पर रात बिताने के बाद नौ जुलाई को सुबह पुन: चढ़ाई शुरू की और अमरनाथ बाबा के दर्शन किए।
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उसके बाद शाम छह बजे हम वापस बालटाल पहुंचे। वहां पता चला कि किसी आतंकी को मार दिया गया है। जिस कारण बवाल हो गया है और यात्रा बंद कर दी गई है। अब हम क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी मलोट (पंजाब) के लोगों ने लंगर लगाया हुआ था उनसे मुलाकात हुई उसी ने सहारा दिया। रात को सोना था। एक कश्मीरी से सहारा मांगा। उसके पास दो तंबू थे। एक में रोहतक के युवक सोए हुए थे। दूसरे में रसोई बना रखी थी। रसोई का सामान हटाने के बाद वह हमारे के लिए खाली हुआ। हम चार लोगों ने किसी तरह वहां रात गुजारी।


आंतकी के मारे जाने और पूरेे वाकये के बारे में तो हमें तंबू मालिक से जानकारी मिली। 10 जुलाई को दिल्ली, बरनाला, बुड़लाढा के निवासियों की ओर से लगाया हुआ लंगर खाकर पेट भरा। जयपुर निवासियों ने वहां एक केंद्र बनाया हुआ है। वहां से वे माइक में सूचनाएं देते रहते हैं। हम बस को ढूंढने में निकल गए। हमें बस नहीं मिली। हम वहां की बस लेकर किसी न किसी तरीके से जम्मू पहुंचना चाहते थे। सुबह से शाम हो गई, लेकिन टिकट नहीं मिली।
 एक फौजी ने बताने पर हम एसपी (ट्रैफिक) से मिले, उनकी मिन्नतें की। लेकिन काम नहीं बना। 11 जुलाई की सुबह एक बस वाले ने बालटाल से जम्मू तक के लिए 30 हजार रुपये की मांग की। हमारे पास कोई चारा नहीं था। हम 43 लोग थे। 500-500 रुपये  इक्ट्ठे करके बस किराए पर की। आगे चले तो 125 किलोमीटर लंबा जाम मिला। 12 जुलाई को कुछ युवकों ने पत्थर मारकर बस का शीशा तोड़ डाला। हम सहम गए। नाके पर खड़े डीएसपी से सहायता मांगी। सहायता की बजाए डीएसपी ने कहा कि यहां लेने क्या आते हो, आपका भगवान वहां भी है। सब सन्न हो गए।


उसके बाद तो हमारा पुलिस पर से विश्वास कमजोर हो गया। उसके बाद हम मीरपुर में बीएसएफ कैंप में ठहरे। वहां हमें हमारी बस मिल गई। चालक तथा परिचालक ने बताया कि वह यहां ठहरे हुए थे, वहां महिलाओं तथा युवकों ने आग लगा दी। महिलाओं ने उन्हें पीटा, पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने के लिए कहा। साथ में इस्लाम कबूल है यह कहने के लिए कहा। फौजियों ने वहां आकर हमें बचाया। 13 जुलाई को फौजी मिला, उसने अपनी मजबूरी गिनाई। हरियाणा के रहने वाले इस फौजी का कहना था कि सरकार ने उनके हाथ बांध रखे हैं। आंखों के सामने देश विरोधी नारे लगते हैं, हम कुछ नहीं कर सकते। कश्मीरी खुद को गुलाम समझते हैं। वह हमें कैंप के भीतर ही एक कश्मीरी की स्टाल पर ले गया। 14 को हम जम्मू पहुंच गए। जैसे-तैसे बचते बचाते हम डबवाली पहुंचे।
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(अरमनाथ से लौटे दिनेश कुमार, अजय कुमार की जुबानी)
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