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Sirsa News: सीडीएलयू की 57 एकड़ जमीन बचाने नागरिक परिषद लड़ेगी आर-पार की लड़ाई

Thu, 05 Nov 2026 12:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
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- सीडीएलयू की जमीन विवाद में नागरिक परिषद मिल चुकी है मुख्यमंत्री से, दिवाली के बाद दोबारा मुलाकात करेंगे
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- राजनीतिक और सामाजिक लोग हुए एकजुट, बोले- विश्वविद्यालय की जमीन पर कथित भू-माफिया को कब्जा नहीं होने देंगे

फोटो - 24

संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय (सीडीएलयू) की 57 एकड़ 4 कनाल 9 मरला भूमि को भू-माफिया से बचाने के लिए नागरिक परिषद ने व्यापक जन अभियान छेड़ा है। राजनीतिक और सामाजिक लोग एक मंच पर एकजुट हुए हैं।
परिषद ने कहा कि विश्वविद्यालय की जमीन को बिल्डरों के व्यावसायिक हितों की भेंट नहीं चढ़ने दिया जाएगा। जरूरत पड़ने पर परिषद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में पक्षकार बनकर कानूनी लड़ाई भी लड़ेगी।
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बुधवार को सिरसा क्लब में पत्रकारवार्ता हुई। नागरिक परिषद के अध्यक्ष जगदीश चोपड़ा और सचिव सुरेंद्र भाटिया ने जानकारी दी। परिषद तीन प्रमुख मुद्दों पर काम करेगी। इनमें विश्वविद्यालय का संपूर्ण विकास शामिल है। जमीन को कथित भू-माफिया के प्रभाव से बचाना भी एक मुद्दा है।
वास्तविक गरीब काश्तकारों को न्याय दिलाना भी परिषद का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई सिरसा की आने वाली पीढ़ियों के शैक्षणिक भविष्य के लिए है। दो दिन पहले मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से चंडीगढ़ में मुलाकात हुई थी। परिषद ने विश्वविद्यालय की विवादित भूमि का मामला उठाया।
मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि जमीन बिल्डरों के हाथों में नहीं जाएगी। सरकार इसे सुरक्षित रखने के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। हाईकोर्ट में भी मामले की मजबूती से पैरवी की जाएगी। मुख्यमंत्री के आश्वासन से उम्मीद जगी है। इसे ठोस प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई में बदलना जरूरी है।
मुख्यमंत्री से दोबारा मुलाकात और समर्थन
दिवाली के बाद जिले के गण्यमान्य नागरिक, राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और कानून विशेषज्ञ मुख्यमंत्री से दोबारा मिलेंगे। वे भूमि संरक्षण के लिए प्रभावी कानूनी रणनीति बनाने की मांग करेंगे। इनेलो जिलाध्यक्ष जसबीर सिंह जस्सा, जेजेपी जिलाध्यक्ष अशोक वर्मा, बार एसोसिएशन अध्यक्ष रघुबीर सिंह खिंडा और कांग्रेस प्रवक्ता आनंद बियानी ने अभियान को समर्थन दिया। आढ़ती एसोसिएशन प्रधान प्रेम बजाज, आम आदमी पार्टी से श्याम लाल मेहता, पूर्व रोटरी गवर्नर भूपेश मेहता भी इसमें शामिल हैं। डॉ. वेद बैनीवाल, रमेश गोयल, रमेश मेहता, प्रदीप मेहता, रमेश साहुवाला, हरबंस नारंग, भूपेंद्र खट्टर और अधिवक्ता कपिल सहित कई अन्य प्रतिनिधियों ने भी समर्थन दिया। वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. केवी सिंह ने वीडियो कॉल के माध्यम से पूरा सहयोग देने का भरोसा दिलाया।

विश्वविद्यालय की विवादित भूमि और विस्तार की आवश्यकता
अध्यक्ष जगदीश चोपड़ा और सुरेंद्र भाटिया ने भूमि की स्थिति बताई। विश्वविद्यालय को शुरुआत में 348 एकड़ 4 कनाल भूमि आवंटित हुई थी। इसमें से लगभग 135 एकड़ भूमि वापस ली जा चुकी है। वर्तमान में विश्वविद्यालय के पास करीब 213 एकड़ भूमि है। इसमें से 57 एकड़ 4 कनाल 9 मरला भूमि विवादित है। विश्वविद्यालय में नए शैक्षणिक विभागों का विस्तार आवश्यक है। आधुनिक शोध केंद्रों, प्रयोगशालाओं और छात्रावासों के लिए भी भूमि चाहिए। खेल सुविधाओं के विस्तार के लिए भी पर्याप्त भूमि जरूरी है। यदि विवादित भूमि नियंत्रण से बाहर हुई तो विस्तार की संभावनाएं प्रभावित होंगी।

निजी समझौतों और काश्तकारों के हितों की जांच
परिषद पदाधिकारियों ने निजी समझौतों की जांच की मांग की। विश्वविद्यालय की जमीन को लेकर बिल्डरों को लाभ पहुंचाने की आशंकाएं जताई जा रही हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि भूमि से संबंधित कोई निजी समझौते हुए हैं तो उनकी वैधानिकता जांची जाए। किसी व्यावसायिक समूह के हित जुड़े हों तो उनकी पारदर्शी जांच हो। बिना जांच किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थान की जमीन का निजी मुनाफे के लिए इस्तेमाल गलत है। ऐसी गैरकानूनी कोशिश का विरोध किया जाएगा।
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हाईकोर्ट के फैसले और कानूनी स्थिति
नागरिक परिषद ने गरीब काश्तकारों के हितों की भी पैरवी की। विश्वविद्यालय की जमीन बचाने का अर्थ वर्षों से खेती कर रहे काश्तकारों के साथ अन्याय करना नहीं है। जिन पट्टाधारकों के वैधानिक अधिकार प्रमाणित होते हैं, उन्हें उचित मुआवजा, पुनर्वास अथवा वैकल्पिक कृषि भूमि मिलनी चाहिए। सरकार की गठित समिति में विश्वविद्यालय प्रशासन, राजस्व विभाग, कानूनी विशेषज्ञ और प्रभावित काश्तकारों का पक्ष सुना जाए। इससे एक संतुलित समाधान निकाला जाना चाहिए। परिषद पदाधिकारियों ने भूमि विवाद की कानूनी स्थिति बताई। 21 सितंबर 2022 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पांच याचिकाओं में किरायेदारों की बेदखली के आदेश निरस्त किए थे। न्यायालय ने पंजाब किरायेदारी अधिनियम, 1887 के तहत कानूनी प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता बताई। परिषद के अनुसार, इस फैसले में पट्टाधारकों को जमीन का मालिक घोषित नहीं किया गया था। विश्वविद्यालय ने इसके बाद पांच अपीलें दायर कीं। 27 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार के सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिए। उन्हें निजी प्रतिवादियों को भूमि आवंटित करने की वैधानिक संभावना पर निर्णय लेकर न्यायालय में अपना पक्ष प्रस्तुत करना था। परिषद ने कहा कि विवादित भूमि किसी पट्टाधारक या बिल्डर को सौंपने का कोई अंतिम आदेश नहीं हुआ है। ऐसे में सरकार के पास विश्वविद्यालय के हितों की रक्षा के लिए कानूनी रूप से प्रभावी कदम उठाने का अवसर है।
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