जिले की पांचों सीटें जीतकर इनेलो ने न केवल अपना घर बचाया, बल्कि सिरसा सीट पर कब्जा करके यहां का सूखा भी दूर कर लिया।
पिछली बार यहां से निर्दलीय प्रत्याशी गोपाल कांडा विजयी हुए थे, जबकि बाकी चार सीटें इनेलो के पास ही थी। उधर, कांग्रेस को आपसी गुटबाजी के चलते भितरघात का शिकार होना पड़ा।
मोदी की लहर और डेरे का समर्थन भी भाजपा की नैया पार नहीं लगा सका। भाजपा ऐलनाबाद को छोड़कर अन्य सीटों पर तीसरे स्थान पर रही।
रानियां और कालांवाली और सिरसा में हलोपा का प्रदर्शन भी बेहतर रहा, लेकिन कांडा जीत दर्ज करने में कामयाब नहीं हो सके।
सिरसा में भाजपा की भितरघात ने इनेलो को जितवाया
सिरसा में कांग्रेस का ही जलवा रहा है। भाजपा ने 1996 में और लोकदल ने 1987 में जीत हासिल की थी। इस बार कांग्रेस को भितरघात का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर और मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच सीटों को लेकर मचा घमासान हार का कारण बना।
तंवर ने इस सीट से नवीन केडिया को उम्मीदवार बनाया तो टिकट के प्रबल दावेदार रहे होशियारी लाल और भूपेश मेहता नाराज होकर घर बैठ गए।
मेहता के समर्थकों ने टिकट बंटवारे का विरोध किया था। दोनों ही नेता केडिया के साथ खुलकर नहीं आए। कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी किनारा किया।
नाराज गुट के कुछ लोग कांडा की ओर और कुछ इनेलो की ओर चले गए। इनेलो के मक्खन लाल सिंगला जहां ग्रामीण क्षेत्र में मजबूत रहे तो दूसरी ओर भाजपा की सुनीता सेतिया को भितरघात का सामना करना पड़ा।
उनसे पहले भाजपा के आठ कट्टर दावेदार थे, जिन्हें पीछे छोड़कर सेतिया ने टिकट हासिल किया था। सेतिया के पिता लक्ष्मण दास अरोड़ा यहां से पांच बार विधायक चुने गए, लेकिन वे नहीं जीत सकीं।
कांडा ने इनेलो को टक्कर तो दी, लेकिन जीत नहीं सके। इनेलो की ग्रामीण क्षेत्र में पकड़ ही उसकी जीत का प्रमुख कारण रहा। इनेलो 1987 के बाद इस सीट पर जीत हासिल करने में कामयाब रही।
ऐलनाबाद में दोस्त को हराकर जीते अभय
ऐलनाबाद में इनेलो-भाजपा के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली। इनेलो उम्मीदवार अभय सिंह चौटाला के ही दोस्त भाजपा उम्मीदवार पवन बैनीवाल को हर गांव में लोगाें का समर्थन मिला।
भाजपा को डेरा के समर्थन की संजीवनी जरूर मिली। ऐलनाबाद से अभय सिंह चौटाला ने उपचुनाव लड़ा और कांग्रेस के भरत सिंह को हराकर चुनाव जीता।
ऐलनाबाद शुरू से ही इनेलो का गढ़ रहा, भाजपा ने अभय सिंह के ही साथी को भाजपा का टिकट देकर इनेलो के गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश की थी।
इस सीट पर अमित शाह और मोदी का जादू नहीं चला और सीट पिछली जीत के रिकार्ड को तोड़ती हुई इनेलो के खाते में चली गई।
इनेलो के साथ सहानुभूति वोट का भी सहारा मिला। कांग्रेस के लिए यह सीट शुरू से ही कमजोर मानी जा रही थी।
कांग्रेस ने जब युवा रमेश भादू को मैदान में उतारा था तो पूर्व विधायक भरत सिंह बैनीवाल की नाराजगी से साफ जाहिर हो गया था कि कांग्रेस ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाएगी। मुकाबला भाजपा और इनेलो के बीच ही रहा।
रानियां में चला जाति फैक्टर, कांग्रेस में भितरघात
रानियां क्षेत्र इनेलो का गढ़ रहा है। रानियां सीट बनने के बाद पहली बार इनेलो के ही कृष्ण कंबोज ने जीत हासिल की।
इस सीट पर इनेलो की जीत का सबसे प्रमुख कारण इनेलो उम्मीदवार रामचंद्र कंबोज का कंबोज बिरादरी से होना रहा, जिसके इस क्षेत्र में करीब 24 हजार वोट हैं और इस बिरादरी से अन्य कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं रहा।
भाजपा को डेरे का सहारा जरूर मिला, जो जमानत बचाने में सहायक रहा। कांग्रेस को भितरघात का सामना करना पड़ा क्याेंकि क्षेत्र के लोग कांग्रेस की ओर से किसी सिख उम्मीदवार को चाहते थे।
कांग्रेस के जिला प्रधान मलकीत सिंह खोसा ने ही दावा किया था टिकट न मिलने पर उन्होंने ही सबसे पहले इस सीट पर कांग्रेस के विरोध का ऐलान किया था।
कांग्रेस और भाजपा को पीछे छोड़ते हुए हलोपा ने इस सीट पर शानदार प्रदर्शन करते हुए सभी को हैरत में डाल दिया।
चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया कि कांग्रेस के वोट पर हलोपा ने कब्जा किया और यही कांग्रेस की हार का एक कारण भी बना।
कालांवाली में छाया बादल का जादू
पंजाब की सीमा से सटे इस क्षेत्र के सिखों पर पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का प्रभाव रहा, जिसके चलते शिरोमणि अकाली दल अपनी सीट बचाने में फिर कामयाब रहा।
पहले यह क्षेत्र रोड़ी विधानसभा में आता था, जहां पर अधिकतर इनेलो ने जीत हासिल की। बाद में कालांवाली के रूप में नई विधानसभा सीट बनी।
पिछले चुनाव में इनेलो ने यह सीट अकाली दल के लिए छोड़ी। अकाली दल ने चरणजीत सिंह रोड़ी को मैदान में उतारा और जीत हासिल की।
इस बार भी शिअद ने बलकौर सिंह को उम्मीदवार बनाया। इनेलो का कट्टर वोट बैंक और अकाली दल का प्रभाव ही शिअद उम्मीदवार बलकौर सिंह की जीत का आधार बना।
डेरा द्वारा भाजपा को समर्थन दिए जाने से नाराज सिख मतदाता शिअद की झोली में चला गया। कांग्रेस को यहां पर भी भितरघात का सामना करना पड़ा।
पूर्व विधायक मनीराम केहरवाला को जब कांग्रेस से टिकट नहीं मिली तो उन्होंने भाजपा का दामन थामा।
डबवाली में चला इमोशनल कार्ड
इनेलो का गढ़ माने जानी वाली सीट पर एक बार फिर इनेलो ने कब्जा कर साबित कर दिया कि दूसरे दल उनकी जमीन पर पैर रखकर खडे़ नहीं हो सकते।
मुकाबला बहू नैना सिंह (इनेलो) और चाचा ससुर डॉ. केवी सिंह (कांग्रेस) के बीच रहा। नैना को महिला होने का लाभ मिला क्योंकि वे देवीलाल की परिवार की पहली महिला हैं जिन्होंने चुनाव लड़ा।
दूसरे उन्हें सहानुभूति का भी लाभ मिला। कांग्रेस को इस सीट पर भितरघात का सामना करना पड़ा। कांग्रेस की स्थानीय इकाई सिख को टिकट दिए जाने के पक्ष में थी और प्रदेशाध्यक्ष भी ऐसा ही चाहते थे पर टिकट मुख्यमंत्री के खास केवी सिंह को मिल गया।
भितरघात ही उनकी हार का कारण बना। इसी सीट पर सिखाें ने भी कांग्रेस से दूरी बनाए रखी। भाजपा डेरा का समर्थन पाकर जमानत बचाने में सफल रही।