सिरसा। नहरी पानी की बंदी का फसलों की बिजाई पर सीधा असर देखने को मिल रहा है। अभी तक 10 से 20 प्रतिशत ही कपास की बिजाई अभी हुई है, जो बोरवेल के पानी से की गई है। बोरवेल के पानी से नरमा और कपास की फसल के उगने और कामयाब होना बड़ी चुनौती होता है। भूमिगत पानी के भरोसे धान की बिजाई संभव नहीं होगी। इसलिए धान से 10 से 15 प्रतिशत किसान दूरी बनाएंगे। ग्वार का रकबा भी इस बार कम होने की उम्मीद है। ग्वार की औसत भी पिछली बार कम आई थी और उसके मूल्य में भी इजाफा नहीं हुआ था।
कृषि अधिकारियों के अनुसार ट्यूबवेल के पानी से कपास व नरमे की बिजाई करने से उनके उगने की क्षमता कम हो जाती है। उगने के बाद पौधे का जलने का खतरा कई गुणा बढ़ जाता है। नहरी पानी से दोनों का खतरा नहीं रहता है। इस कारण बीज कंपनियां भी किसान को बीज देने से घबरा रही है, क्योंकि उत्पादन की गारंटी टयूबवेल के पानी में कोई कंपनी नहीं लेती है। बावजूद इसके इस बार 10 प्रतिशत रकबा नरमा और देसी कपास का बढ़ेगा।
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राजस्थान के साथ लगते रकबे का उत्पादन बारिश भरोसे
राजस्थान के साथ लगते एरिया में मौजूदा समय में नहरी पानी उपलब्धता नहीं है। बोरवेल का पानी भी बिजाई के योग्य नहीं है। ऐसे में ऐलनाबाद व चोपटा क्षेत्र का एरिया बारिश के भरोसे व नहरी पानी के भरोसे है। नहरी पानी की उपलब्ध संभव नहीं है तो अब बारिश के भरोसे ही ग्वार, नरमा , देसी कपास और बाजरे की बिजाई इस एरिया में अब होने की उम्मीद है।
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किसान धान से बनाएंगे दूरी
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार घग्गर में बाढ़ आने के बाद पिछली बार धान के रकबे में इजाफा हुआ था। हाइब्रिड बीज के सहारे धान की बिजाई हुई थी, लेकिन इस बार ऐसा संभव नहीं है। भूमिगत पानी के भरोसे धान की बिजाई संभव नहीं होगी। इसलिए धान से 10 से 15 प्रतिशत किसान दूरी बनाएंगे। ग्वार का रकबा भी इस बार कम होने की उम्मीद है। ग्वार की औसत भी पिछली बार कम आई थी और उसके मूल्य में भी इजाफा नहीं हुआ था। पिछली बार नरमा 132000 हेक्टेयर में लगाया गया था। इस बार 10 प्रतिशत का इजाफा होगा। बाजरा जो 7000 हेक्टेयर में लगाया गया था, इस बार 10000 से ऊपर रहने की उम्मीद है।
कोट्स
नहरी पानी की कमी का असर फसलों पर सीधे तौर पर देखने को मिलेगा। मौजूदा समय में देसी कपास व नरमे की 20 प्रतिशत बिजाई हुई है। जो बोरवेल से हुई है। नहरी पानी की कमी के चलते इस बार धान का रकबा भी घटेगा। नहरी पानी फसलों के लिए अमृत है। भूमिगत पानी कई एरिया में कामयाब नहीं है। -डाॅ. सुखदेव सिंह कंबोज, उप निदेशक कृषि विभाग