डबवाली। राष्ट्रीय किसान संगठन एवं समस्त किसान यूनियनों के बैनर तले तहसील कांप्लेक्स में चल रहा धरना व क्रमिक भूख हड़ताल सोमवार को 28वें दिन में प्रवेश कर गई। अभी किसानों की कोई सुनवाई नहीं हो पाई है। इससे गुस्साए किसानों ने सोमवार से दिन-रात क्रमिक अनशन शुरू कर दिया है और तहसील कांप्लेक्स से चलकर पूरे शहर में ट्रैक्टर-ट्रालियों व पैदल चलते हुए रोष प्रदर्शन किया व सरकार तथा प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
सोमवार को गांव आसाखेड़ा के किसान शीशपाल वर्मा, गांव अलीकां के बुध सिंह, लोहगढ़ के मनजीत नोकवाल, सकताखेड़ा के बिंदर सिंह व गांव मलिकपुरा के गुरसेवक सिंह क्रमिक अनशन पर रहे। इसके अलावा विभिन्न गांवों से आए किसान धरने में शामिल हुए। इस अवसर पर राष्ट्रीय किसान संगठन के प्रदेशाध्यक्ष जसवीर सिंह भाटी ने कहा कि एक तरफ तो किसानों को धरतीपुत्र व अन्नदाता कहकर संबोधित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर आज किसानों की हालत भिखारियों जैसी हो चुकी है। जिन्हें अपनी मांगें मनवाने के लिए झोली तक फैलानी पड़ रही है। इसके बावजूद भी इस गूंगी-बहरी व किसान विरोधी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इसका खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सोमवार को सभी किसान साथियों ने मिलकर शहर में रोष प्रदर्शन किया। लेकिन इससे आगे किसान अपनी मांगें मनवाने के लिए ओर भी सख्त रवैया अख्तियार कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अब किसान आरपार की लड़ाई करने के मूड़ में है। अब यह देखना बाकी है कि सरकार कब तक उनकी मांगों को मंजूर नहीं करती। किसान विरोधी सरकार पर तंज कसते हुए उन्होंने शायराना अंदाज में कहा कि %सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है। उन्होंने बताया कि सोमवार को सभी किसानों ने आढ़तियों व व्यापारियों से भी उन्हें अपना समर्थन देने की अपील करते हुए कहा कि वह बृहस्पतिवार को किसानों को अपना भरपूर समर्थन देते हुए अपने-अपने प्रतिष्ठान बंद रखें। ताकि एकजुटता के साथ सरकार को झुकाया जा सके। मंच संचालन अमरीक बिश्नोई मौजगढ़ ने किया। इस अवसर पर हनुमान मुंड, राजाराम पारीक, सतीश, ओम प्रकाश गोस्वामी, गुरहंस, मिठ्ठू कंबोज, राकेश नेहरा, राजेश लखुआना, सुरेश पूनिया, अंग्रेज मांगेआना, नाजम सिंह मौजगढ़, प्रितपाल मौजगढ़, मलकीत सकताखेड़ा, मलकीत पन्नीवाला, अमृतपाल मौजगढ़, नछत्तर सिंह पन्नीवाला, नछतर लोहगढ़, गमदूर सिंह पन्नीवाला रुल्दू किसान मौजूद थे।