वर्ष 1992 में दसवीं अनुसूची को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लाया गया और किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू और अन्य के एक ऐतिहासिक मामले के तहत इसकी सांविधानिकता को चुनौती दी गई। वर्ष 2003 में 91वें संशोधन के माध्यम से नियमित दल-बदल से निपटने के लिए दल परिवर्तन कानून को और अधिक प्रभावी बनाया गया। इसने उन प्रावधानों को हटा दिया, जो पार्टी में विभाजन के मामले में विधायकों को संरक्षण प्रदान करते थे।
दल बदल कानून 52वें संशोधन अधिनियम 1985 के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था। इसे भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया है और सामान्यतः इस अधिनियम को दल-बदल कानून कहा जाता है।
दल-बदल को निष्ठा या कर्तव्य का सचेत परित्याग के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें दल-बदल के आधार पर निरर्हता के बारे में प्रावधान किया गया है। पीठासीन अधिकारी के पास दल-बदल के सिद्ध आधार पर किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का अधिकार होता है। इसका लक्ष्य विधायकों को उनके कार्यकाल के दौरान राजनीतिक संबद्धता में परिवर्तन करने से रोकना था। यह संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू होता है।
जनता दल यूनाइटेड के दो सदस्यों को वर्ष 2017 में राज्यसभा के सभापति द्वारा अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया गया था। उन्होंने कई कार्यक्रमों में सार्वजनिक मंचों पर पार्टी की आलोचना की थी और विपक्षी दलों की रैलियों में भाग लिया था। दल-बदल का एक अन्य आधार निर्देशों का उल्लंघन है।
इसका अर्थ यह है कि यदि विधायक उस राजनीतिक दल द्वारा जारी किए गए निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से दूर रहता है तो उसे अयोग्य माना जाता है। राजनीतिक दल द्वारा जारी निर्देश को पार्टी व्हिप के नाम से जाना जाता है।
एक विधायक को आगे भी अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि वह स्वतंत्र रूप से निर्वाचित सदस्य है और एक राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। एक विधायक को अयोग्य घोषित माना जाएगा यदि वह एक मनोनीत सदस्य है और विधायक बनने की तिथि से छह माह बाद किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
पीठासीन अधिकारी जो दल-बदल की अयोग्यता के आधारों की वैधता का निर्णय करता है, का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है। वर्ष 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में पीठासीन अधिकारी के फैसले के खिलाफ अपील की अनुमति दी थी, लेकिन जब तक पीठासीन अधिकारी अपना आदेश नहीं देता तब तक कोई न्यायिक हस्तक्षेप नहीं हो सकता।
विशेषज्ञ की राय
दल-बदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल) सदन सदस्यों (संसद सदस्य और राज्य विधानमंडल सदस्य) ने बार-बार दल-बदल पर अंकुश लगाने के लिए लागू किया गया था। इसे वर्ष 1985 में 52वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया। यह ऐसे मामलों में निर्वाचित सदन सदस्य को सदन से निरर्हता या अयोग्य ठहराने का प्रावधान करता है। जहां वे स्वेच्छा से दल बदल लेते हैं या अपने दल के निर्देश के विरुद्ध सदन में मतदान करते हैं। - डॉ. रेनु राणा, एचओडी, राजनीतिक विज्ञान, पंडित नेकीराम शर्मा राजकीय महाविद्यालय।
उद्देश्य : यह किसी पद या भौतिक लाभ अथवा ऐसे अन्य विचारों के प्रलोभन से प्रेरित दल परिवर्तन को रोकने के उद्देश्य से लाया गया है।
- यह विधायकों को किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ हासिल करने के लिए एक राजनीतिक संघ से दूसरे राजनीतिक संघ में स्थानांतरित होने से रोकता है।
- यह दलीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखता है और सरकारों को गिराने के खतरे को रोकता है।
- विधायक पार्टी व्हिप के पक्ष में मतदान करें इस बात को सुनिश्चित करते हुए यह पार्टी दलीय अनुशासन को बढ़ावा देता है।
- यह सदस्यों की निरर्हता योग्य ठहराए बिना राजनीतिक दलों के विलय की अनुमति देता है।
- यह लोकतंत्र की संस्था को मजबूत करता है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाता रखता है।
अपवाद : किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हैं तो इस प्रकार के विलय के मामले में कानून एक पार्टी को किसी अन्य पार्टी में विलय करने में सक्षम बनाता है। न विलय का फैसला करने वाले सदस्य को निरर्हता का सामना करना पड़ेगा और न मूल पार्टी में बने रहने वाले सदस्य को।
सुप्रीम कोर्ट ने की व्याख्या : सर्वोच्च न्यायालय ने दल परिवर्तन कानून के विभिन्न प्रावधानों की व्याख्या की है। सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक है स्वेच्छा से अपनी सदस्यता का त्याग करना। इसका अर्थ त्याग पत्र की तुलना में अधिक व्यापक है। औपचारिक त्याग पत्र के अभाव में सदस्यता के त्याग का अनुमान विधि निर्माता के रूप में आचरण से लगाया जा सकता है।