मुकेश देवी ने बताया कि पति की तबीयत खराब होने के बाद बेटे प्रवीण व बेटी मीनू की पढ़ाई और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई। काम शुरू करने के बाद समाज के ताने भी सुनने पड़े। कई लोगों ने कहा कि एक महिला होकर ऐसा काम करना ठीक नहीं है।
जहां कुछ काम पुरुषों तक सीमित माने जाते थे, वहीं अब महिलाएं संभालने लगी हैं। आदर्श नगर की मुकेश देवी के पति जय भगवान को वर्ष 2007 में हृदयाघात आया तो डाॅक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी। इससे परिवार की रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। मुकेश देवी ने हार न मानते हुए पति की पंक्चर की दुकान खुद संभाल ली। उनका जीवन दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत है।
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मुकेश देवी ने बताया कि पति की तबीयत खराब होने के बाद बेटे प्रवीण व बेटी मीनू की पढ़ाई और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई। काम शुरू करने के बाद समाज के ताने भी सुनने पड़े। कई लोगों ने कहा कि एक महिला होकर ऐसा काम करना ठीक नहीं है। दूसरों की बातों पर ध्यान देने के बजाय परिवार की जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी। पीछे हटती तो बच्चों व बीमार पति के लिए दवा तक खरीदना मुश्किल हो जाता।
पति के बीमार होने के बाद बच्चों ने पूछा कि अब उनका क्या होगा। उनके इस सवाल ने उन्हें हिम्मत दी और ठान लिया कि अब हार नहीं मानूंगी। खुद टायर पंक्चर लगाना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी लेकिन हौसले से आगे बढ़ती रहीं। पीछे नहीं हटी। संवाद
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19 साल के संघर्ष ने बदली तस्वीर
लगातार 19 साल तक मेहनत और संघर्ष करते हुए बेटे प्रवीण और बेटी मीनू को पढ़ा-लिखाकर कामयाब बनाया। उनकी शादी की। बेटा प्रवीण वकालत में भविष्य संवारने में जुटा है।