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Rohtak News: रोहतक में गुजरात के करघों पर तैयार होगी तमिलनाडु की कांचीपुरम साड़ी

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नंदिनी शर्मा
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रोहतक। दक्षिण भारत की परंपरागत हाथ की बुनाई की तकनीक और उसके साथ ही वहां की संस्कृति अब हरियाणवियों के दिलों को छुएगी।
देश और दुनिया भर में मशहूर तमिलनाडु की कांचीपुरम साड़ी हरियाणा में सियासत के अखाड़े और अन्न के कटोरे माने जाते रोहतक के लोगों को अपने करिश्माई आकर्षण में कैद करने के लिए तैयार है। इसके लिए उत्तर भारत के महत्वपूर्ण संस्थानों में से एक पंडित लख्मीचंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (सुपवा) ने विशेष तैयारी शुरू कर दी है।
सुपवा में कांचीपुरम साड़ी तैयार करने के लिए खासतौर पर गुजरात से टेबल टॉप करघे मंगवाए गए हैं। जिन पर सुपवा के टेक्सटाइल विभाग के विद्यार्थी कांचीपुरम साड़ी के नमूने बनाना सीखेंगे। उसके बाद दक्षिण भारत की इस पारंपरिक कला का पूरे हरियाणा में प्रसार होगा। टेक्सटाइल विभाग के अध्यक्ष अनिल कुमार ने विशेष बातचीत में बताया कि विद्यार्थियों टेबल टॉप करघों पर एक्स्ट्रा वेफ्ट तकनीक से कपड़े की बुनाई सिखाई जाएगी। जिसके बाद वे कांचीपुरम साड़ी का नमूना तैयार करेंगे। इन करघों पर विद्यार्थियों को कई और बुनाई तकनीक भी सिखाई जाएंगी। जिसके बाद वे कई आकर्षक नमूने तैयार करने में सक्षम होंगे। उन्होंने बताया कि गुजरात से आए ये विशेष करघे मल्टी शाफ्ट डिजाइन के कारण हैंडल करघे की तुलना कहीं बेहतर माने जाते हैं। क्योंकि इनके माध्यम से विद्यार्थी हैंडल करघे की तुलना में काफी ज्यादा जटिल पैटर्न बुन सकेंगे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी पहले भी एक्स्ट्रा वेफ्ट तकनीक से कुछ चीजें बना चुके हैं। लेकिन अब वे टेबल टॉप करघों पर हाथ से बुनाई तकनीक के माध्यम से कांचीपुरम साड़ी समेत कई आकर्षक चीजें तैयार करेंगे। इसके लिए विद्यार्थियों के साथ मिल कर योजना तैयार की जा रही है।
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आज भी राज करती है कांचीपुरम साड़ी
तमिलनाडु की कांचीपुरम साड़ी आज भी महिलाओं के दिलों पर राज करती है। नई तकनीक और डिजाइन के बाद भी दशकों से कांचीपुरम साड़ी का जलवा आज भी बरकरार है। इसे शुद्ध शहतूत के रेशम के धागों से बुना जाता है। इसके बॉर्डर और पल्लू में कंट्रास्ट डिजाइन होते हैं, दोनों को अलग-अलग ही बुना जाता है, फिर एक साथ इंटरलॉक किया जाता है। इससे बुनने में सोने के धागे का भी प्रयोग किया जाता है, जो लाइनों व बिंदियों के आकार में होता है। इन साड़ियों की कीमत भी काफी ज्यादा होती है। इसके डिजायन दक्षिण भारत के प्रमुख मंदिरों और प्रकृति से प्रेरित होते हैं। कांचीपुरम साड़ी को बुनने वाले मल्टी शाफ्ट करघे के दो हिस्से वार्फ और वेफ्ट होते हैं। इनके जरिए कपड़े को करघे पर बुना जाता है। करघे के वेफ्ट हिस्से में धागे को सीधा लगाया जाता है। जबकि, वार्फ हिस्से में धागे को लंबा लगाया जाता है। धागा सेट होने के बाद ताने-बाने के जरिए धागों को आपस में जोड़ा जाता है। साड़ियों के डिजाइन के लिए सबसे पहले ग्राफ तैयार किया जाता है, जिसके अनुसार धागों को आपस में जोड़ा जाता है। जिस प्रकार धागा जुड़ता है, उसी प्रकार साड़ी का डिजाइन तैयार होता है।
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