शहर में सेक्टर 27-28 में आवासीय-व्यावसायिक सेक्टर बनाने के उद्देश्य से अधिग्रहित की गई तीन गांवों की जमीन का अधिग्रहण सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। गढ़ी बोहर, खेड़ी और पहरावर की लगभग 850 एकड़ जमीन 2002 में ओमप्रकाश चौटाला सरकार में हुड्डा द्वारा अधिग्रहित की गई थी। बाद में हुड्डा सरकार में जमीन रिलीज की गई। आरोप है कि जमीन को निजी बिल्डर के हवाले कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डर को दी गई 280 एकड़ जमीन किसानों को रिलीज करने का फैसला सुनाया है। फैसले का गांव गढ़ी बोहर के किसानों ने स्वागत किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अब इसमें न हुडा विभाग होगा और न ही सनसिटी। उन्हें उनकी जमीन वापस मिलनी चाहिए या उन्हें एनसीआर के हिसाब से दाम मिलने चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो आंदोलन किया जाएगा और वे खुद अपने खेतों में जाकर कब्जा कर लेंगे।
पूर्व सरपंच नरेंद्र ने बताया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने निजी कंपनियों का लाइसेंस रद कर दिया है, तो उनसे ली गई जमीन को लौटा देना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो किसानों को नई अधिग्रहण नीति के तहत पैसा मिलना चाहिए। पूर्व में निजी कंपनियों ने यहां दलाल छोड़ रखे थे। किसी की जमीन डेढ़ लाख रुपये प्रति एकड़ में ली तो किसी की जमीन 36 लाख रुपये प्रति एकड़। इनेलो सरकार में सेक्शन चार का नोटिस हुआ था। 800 एकड़ जमीन में सेक्टर 27 व 28 के लिए भू अधिग्रहण हुआ। सेक्शन छह में सेक्टर 28 को छोड़ा गया और 27 को ले लिया गया। इसके करीब डेढ़ माह में अवार्ड सुनाया गया। इसके लिए हुडा ने डेढ़ से पांच लाख रुपये तक प्रति एकड़ किसानों को दिया। वहीं निजी कंपनी ने सात लाख रुपये में प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन लेनी शुरू की जोकि बाद में 33 से 35 लाख तक की कीमत पहुंच गई। वहीं कुलबीर ने बताया कि उनके 13 एकड़ के लिए 35.53 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से कीमत अदा हुई। यही नहीं बाद में सारी जमीन निजी कंपनी को सौंप दी गई। यह किसानों के साथ अन्याय किया गया। अब पिछला अवार्ड रद्द कर नया अवार्ड नये नियमानुसार होना चाहिए। वहीं अधिवक्ता सुनील नांदल ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हम सम्मान करते हैं। लेकिन यह हुडा के फेवर का है। सरकार और अधिकारियों ने मिल कर गड़बड़ की, इसका खामियाजा किसान क्यों भुगते। हुडा ने जमीन ली तो निजी कंपनी को क्यों दे दी। इसकी जांच सरकार को करानी चाहिए। एक साल के अंदर इसका फैसला होना चाहिए। सतबीर, डॉ. केदार व देवव्रत ने बताया कि किसानों की जमीन मूर्ख बना कर ली गई है। इसका समाधान कर किसानों को बर्बाद होने से बचाया जाना चाहिए। सभी ने मांग की है कि किसानों की जमीन उन्हें वापस सौंपी जानी चाहिए। सरकार उनकी जमीन किसी को दे, लेकिन आज की कीमत के हिसाब से उन्हें बकाया मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो वे अपनी जमीन वापस लेकर वसूल की गई कीमत ब्याज सहित लौटाने को तैयार हैं।
बोले पूर्व सीएम
यह भू अधिग्रहण कांग्रेस के कार्यकाल से पहले का है। कानून अपना कार्य करता है। इसमें हस्तक्षेप ठीक नहीं है।
- भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व सीएम, हरियाणा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्या
कोर्ट ने इस भूमि अधिग्रहण को अवैध करार दिया है और 280 एकड़ जमीन किसानों को रिलीज करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने इस मामले में तल्ख टिप्पणी की कि ये अधिग्रहण अमीर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया था और किसान के अस्तित्व की कीमत पर मुनाफाखोरी की गई। हुडा ने गढ़ी बोहर, खेड़ी साध और पहरावर गांव के किसानों की 850 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। जिसे वर्ष 2008 में तत्कालीन सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार ने बिल्डर के हवाले कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि हरियाणा सरकार इस मामले की जांच करवाना चाहे तो करा सकती है। सरकार चाहे तो सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन अपने पास रख सकती है या फिर किसानों को उनकी जमीन वापस लौटा दी जाए। इसमें गढ़ी बोहर की 702 एकड़, खेड़ी की 87 तो पहरावर की 60 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई।